शनिवार, 17 नवंबर 2018

मखमली पेबंद

भारत में ३१ अक्टूबर २०१८ को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने सरदार सरोवर बाँध के समीप गुजरात में ‘सरदार बल्लभ भाई पटेल’ की विश्व में सबसे ऊंची १८२ मीटर, ५८ मीटर आधार सहित कुल २४० मीटर ऊंची भव्य प्रतिमा का अनावरण किया, इस भव्य प्रतिमा के निर्माण में लगभग ३००० करोड़ रुपए व्यय हुए और इसके साथ ही सबसे ऊंची प्रतिमा का रिकॉर्ड भारत के नाम हो गया, निश्चित इससे सम्पूर्ण विश्व में भारत की प्रतिष्ठा बढी होगी, लेकिन इसके साथ ही महाराष्ट्र ने महान मराठा नायक, मुग़ल काल में हिन्दू साम्राज्य की स्थापना करने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज की २१० मीटर ऊंची प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा कर दी है, इसके पीछे विचार था कि इस प्रतिमा को चीन की स्प्रिंग टेम्पल ऑफ़ बुद्धा १५३ मीटर से ऊंची निर्मित कर इसे विश्व में सर्वाधिक ऊंची प्रतिमा का गौरव दिलवाना जाएगा, इसके निर्माण में ३६०० करोड़ रूपए से अधिक धन व्यय होने की संभावना है, इसके अतिरिक्त बाबा साहेब आंबेडकर की भी ३५० फुट ऊंची कांस्य प्रतिमा १०० फुट ऊंचे आधार पर बनाने का प्रस्ताव है, जो स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी से ऊंची होगी, इसके साथ ही स्तूप भी बनेगा, जिसपर अनुमानित व्यय ६०० करोड़ से अधिक होगा, इसी प्रकार अमेरिका की स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी १५१ फुट ऊंची आधार सहित कुल ३०५ फुट ऊंची से अधिक ऊंची १५१ मीटर की भगवान् श्री राम की भव्य कांस्य प्रतिमा अयोद्ध्या में प्रस्तावित है | निश्चित इन सभी प्रतिमाओं के बन जाने पर भारत का मान और गौरव विश्व पटल पर बढेगा, और भारत कम से कम प्रतिमा के मामले में तो अमेरिका को बहुत पीछे छोड़ देगा, ऐसा मानना वर्तमान राजनैतिक दलों और शासकों का है |
यहाँ विश्व की सबसे ऊंची दस प्रतिमाओं का वर्णन पर्स्तुत है, उनमें से सरदार पटेल को छोड़कर कोई भी प्रतिमा किसी राजनेता की नहीं है, सभी प्रतिमाएं सर्व्य्मान्य आदर्शों के प्रतीक या सम्पूर्ण मानवता के कल्याण के लिए कार्य करने वाली विभूतियों की है, राजनेता कभी भी सर्वमान्य नहीं हो सकते हैं, एक वर्ग उनके योगदान को जितना महत्व देगा, दूसरे वर्ग अपनी प्रतिबद्धताओं के चलते किसी अन्य नेता को अधिक महत्व देंगे, और वे अपने आदर्शों के प्रतीकों की भव्य प्रतिमा बनवाना चाहेंगे, फिर भारत में तो इन प्रतिमाओं के साथ ही क्षेत्रवाद का संघर्ष एवं प्रतिस्पर्धा भी प्रारम्भ होती हुई प्रतीत हो रही है | पटेल साहब गुजरात से थे, तो उनकी प्रतिमा गुजरात में स्थापित हो रही है, शिवाजी महाराज मराठा थे, उनकी प्रतिमा महाराष्ट्र में प्रस्तावित है, अब प्रत्येक प्रांत एवं समुदाय के अनेक महान पुरुस हैं, जो वहां वन्दनीय हैं | वैसे भी पटेलजी की प्रतिमा किसी लगाव या सम्मान के रूप में बनी है, ऐसा नहीं लगता है, वास्तव में खंडित भारत के प्रथम प्रधानमंत्री द्वारा अपने एवं स्वयं के परिवार के अतिरिक्त सभी की उपेक्षा से कुंठित राजनेताओं द्वारा नेहरू परिवार के महिमा मंडन से बड़ी रेख खीच कर उनके आभा मंडल को कम करने का प्रयास मात्र किया है | शंका है कि भविष्य में यदि इस प्रकार की प्रतिस्पर्धा बढ़ी तो प्रत्येक प्रांत, और प्रत्येक राजनैतिक दल सत्ता में आने पर अपने अपने आदर्शों की भव्य प्रतिमाएं बनवाना प्रारम्भ न कर दे |
नाम मूर्ती
सम्बन्ध
स्थान
राष्ट्र
ऊंचाई
निर्माण
स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी
सरदार पटेल
सरदार सरोवर बाँध गुजरात
भारत
१८२ मीटर, ५८ मीटर आधार सहित कुल २४० मीटर 
३१ अक्टूबर २०१८
स्प्रिंग टैम्पल बुद्ध (वैरोचन)
महात्मा बुद्ध
लेशान, हेनान
चीन
१२८ मीटर, १९.३ मीटर के कमल सिंघासन एवं २५ मीटर पैडस्टल सहित कुल ऊंचाई १५३ मीटर है
२००८
लेक्यून सेक्टयार (गौतम बुद्ध)
महात्मा बुद्ध
खातकान तांग मोंवा के पास
म्यानमार
११५.८ मीटर, १३.४१ मीटर के कमल सिंघासन सहित कुल ऊंचाई १२९.२ मीटर
२००८
उशिकु दायबुत्सू बुद्ध प्रतिमा
(बुद्ध अमिताभ बुद्ध)
उशिकु आईबराकी प्रीफ्रेक्चर
जापान 
१०० मीटर, १० मीटर सिंघासन और १० मीटर पैडस्टल मिलाकर १२० मीटर
१९९३
सेंदाई डाईकानन
कानन, गुयानयिन
सेंदाई मियागी प्रीफेक्चर
जापान
१०० मीटर
१९९१
गुईशान गुआनयिन
(गुआनयिन) वेइशन
चांगशा हुनान
चीन
९९ मीटर गिल्ड कांस्य मूर्ती
२००९
थाईलैंड के महान बुद्ध
गौतम बुद्ध
आंग थोंग
थाईलैंड
सोने से पुती हुई कंक्रीट की प्रतिमा ९२ मीटर
२००८
किता नो मियाको उद्यान के दाई कानन
कानन बायुक कानन
अशिबेत्सू होक्काइदो
जापान
८८ मीटर
१९८९
द मदर लैंड काल्स
मातृभूमि की प्रतीक महिला
माम्येव कुर्गेन वोल्गोग्राद
रूस
८५ मीटर
१९६७
आवाजी कानन
कानन गुआनयिन

जापान
८० मीटर, २० मीटर पैडस्टल के साथ कुल १०० मीटर
१९८२

यदि विश्व में सर्वाधिक ऊंची प्रतिमा बनवाने की विशेस आवश्यकता थी, तो किसी राजनेता की न होकर, भारत की उन असंख्य सर्वमान्य महान विभूतियों में से (उत्तर दक्षिण को आध्यात्मिक, सांस्क्रतिक रूप से जोड़ने वाले महर्षि अगस्त, शून्य के आविष्कारक ब्रम्हगुप्त, भास्कराचार्य, औषधि विज्ञान के प्रणेता धन्वन्तरी, शुश्रुत, चरक, या वृहत्तर भारत माता की भव्य मूर्ती आदि) किसी की बनाई जा सकती थी, इससे राष्ट्र में मूर्ती निर्माण की प्रतिस्पर्धा नहीं बढ़ती | क्या भारत जैसा राष्ट्र जहां गरीबी रेखा के नीचे २३.६% (२७.६ करोड़) लोग हैं, लगभग २१.५% लोग रोज भूखे सोते हैं, २६% अनपढ़, ५५% बच्चे कुपोषण से ग्रसित हैं, ५१% महिलाएं रक्ताल्पता से ग्रसित हैं, ६०% से अधिक लोगों को सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध नहीं है, पीने योग्य साफ़ पानी तक कहीं उपलब्ध नहीं है, इन मूर्तियों पर होने वाले हजारों करोड़ रुपए के निरर्थक अपव्यय को सहने की स्थिति में है ? चारों ओर अराजकता है, लूट हत्या बलात्कार का बोलबाला है, सुरक्षा बलों की कमी है, उनको वेतन देने के लिए सरकारों के पास धन नहीं है | जनता को सुलभ चिकित्सा, सुलभ शिक्षा, सुलभ सुरक्षा, आदि सरकार के कुछ अति महत्व पूर्ण कार्य है, परन्तु उनके लिए धन का रोना है, इन मूर्तियों के लिए धन की कोई कमी नहीं है, क्योंकि कि इस प्रकार के निर्माण कार्यों में इन माननीयों को मोटा कमीशन प्राप्त होता है | सुरक्षा बलों के वेतन या कर्मचारियों की पेंशन से उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होने वाला है, इसलिए वह अर्थ व्यवस्था पर बोझ है, जबकि विधायकों और सांसदों की पेंशन कोई बोझ नहीं है |
      केवल स्टैच्यू से किसी भी नंगे, भूखे, रोगी, एवं दुराचारी राष्ट्र का सम्मान कभी नहीं बढ़ता है, यह ऐसे ही है कि किसी का पूरा परिवार रोगी, दुराचारी एवं फटे हाल हो और उसका मुखिया अपने जगह जगह से तार तार वस्त्रों को सिल कर आवश्यक लज्जा ढकने के स्थान पर किसी एक जगह कीमती मखमल का पेबंद लगा कर इतराने लगे | आज सर्वाधिक ऊंचे दस स्टैच्यूओं में अमेरिका का स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी कहीं भी नहीं है, फिर भी सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्द है, इस स्टैच्यू का निर्माण भी अमेरिका ने नहीं करवाया है, १८८६ में इसे फ्रांस ने अमेरिका से मित्रता के प्रतीक के रूप में अमेरका को भेंट किया था | क्या अमेरिका इस स्थिति में नहीं है, कि वह सबसे ऊंचा और भव्य स्मारक बनवा ले ? उसने स्टैच्यू नहीं बनवाए, अपितु उसने वह किया जिससे उसको भेंट किया गया एक छोटा सा स्टैच्यू इन सब पर भारी पड़ गया है |

      समाज में या विश्व में गरिमा, सम्मान और गौरव पाने के लिए किसी के लिए भी तीन चीजें आवश्यक हैं : १. चरित्र २. बल ३. सम्पन्नता | हम अमेरिका के स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी से ऊंचे स्मारक बनवा कर, क्या स्वयं के साथ छलावा नहीं कर रहे हैं ? चरित्र के विषय में, अमेरिका में एक वाटर गेट काण्ड में १९७४ में तत्कालीन प्रेसिडेंट निक्सन को सजा सुना दी गई और उन्हें अपना पद तो त्यागना ही पड़ा; वहीं भारत में जनप्रतिनिधि प्रत्येक कार्य में बड़ा कमीशन वसूलते हैं, फिर चाहे बाँध, सड़क, पुल निर्माण हो, रक्षा सौदे हों, बच्चों का भोजन(विद्यालयों में दिया जाने वाला पुष्टाहार, उनकी पुस्तकें, उनकी ड्रेस आदि), गरीबों की दवा की खरीद पर, राष्ट्र के विकास के नाम पर मिलने वाली विकासनिधि पर, इस राष्ट्र में लोकतंत्र के चारों स्तम्भ विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं मीडिया सभी आकंठ भृष्टाचार में डूबे हुए हैं, यहाँ अति संपन्न व्यक्ति भी सामान्य जनता का अरबों रुपया लेकर, जनप्रतिनिधियों के सहयोग से विदेश भाग जाता है | इसी प्रकार अमेरिका में एक अनैतिक प्रेम प्रसंग (मोनिका लेविंस्की एवं क्लिंटन) में १९९८ में वहां के राष्ट्रपति क्लिंटन को अपराधी पाया गया और, दण्डित किया गया; वही भारत में अधिकाँश निर्वाचित जनप्रतिनिधि दुर्दान्त अपराधी एवं व्यभिचारी हैं | अपवाद स्वरूप कुछ को छोड़ दें, तो सभी जनप्रतिनिधियों के अनैतिक सम्बन्ध हैं, इसका प्रभाव समाज पर यह पड़ रहा है कि नारी को माँ मानने वाले इस राष्ट्र में दुधमुही बच्चियों से लेकर अति बुजुर्ग महिलाओं तक के साथ खुले आम बलात्कार हो रहे हैं और अपराधी पकड से बाहर | अब बल की बात की जाय, तो अमेरिका में राष्ट्रद्रोहियों और आतंकियों के साथ कठोर वर्ताव करने में सब एक साथ होते हैं, वहीं भारत में आतंकियों के बचाव के लिए रात्रि में न्यायालय खुलता है, अमेरिका अपने शत्रु को ढूढकर हजारों किलो मीटर दूर बैठे दुसरे राष्ट्र में घुस कर मारने की सामर्थ्य रखता है (ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में घुस कर मारा), वहीं हम अपने शत्रु राष्ट्र को आतंकवादी राष्ट्र घोषित करने में डरते हैं, और अमेरिका से आग्रह करते हैं, कि वह उसे आतंकवादी राष्ट्र घोषित करे | अब सम्पन्नता, तो अमेरिका में सामान्य जनता का जो जीवन स्तर है, जो जन सुविधाएं हैं, जो सुरक्षा व्यवस्था है, क्या हम उसके लाखवें अंश के बराबर भी जनता को दे पा रहे  हैं ? आज अमेरिका अपने धन के प्रभाव से विश्व के किसी भी राष्ट्र को झुकाने में सक्क्षम है, उसके आर्थिक प्रतिबन्ध से बड़ा से बड़ा राष्ट्र भी प्रभावित हो जाता है | अमेरिका ने अपने यहाँ भले ही कोई स्टैच्यू बनाकर धन का अपव्यय न किया हो लेकिन उसकी सामर्थ्य के कारण आज एक छोटा सा स्टैच्यू (स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी) संसार के तमाम विशाल मूर्तियों और स्तंभों पर भारी है | अच्छा होता भारत के नेता इस तथ्य को समझ पाते और राष्ट्र की वास्तविक चारित्रिक, सामरिक, आर्थिक सम्पन्नता को बढाने में ध्यान लगाते तो, कोई भी स्तम्भ या मीनार ही विश्व प्रसिद्द होती |

सोमवार, 29 अक्तूबर 2018

महाभारत

महाभारत
लगभग अब से ५००० वर्ष पूर्व महाभारत हुआ था, जिसके विषय में शंकाएं हो सकती हैं, कि वह हुआ भी था या नहीं, वह काल्पनिक है, वह वास्तविक है आदि आदि; परन्तु एक बात निश्चित है कि वास्तविक जीवन में महाभारत निरंतर होता रहता है, द्रोपदी का चीर हरण प्रतिदिन हो रहा है, केवल पात्रों के नाम बदलते हैं | शासक दुर्योधन है, उसके आधीन व्यवस्था दु:शासन है और सामान्य जनता द्रोपदी है | हम यहाँ १९४७ से कुछ पूर्व से प्रारम्भ हुई महाभारत का सिंघावलोकन करने का प्रयास करेंगे | पिछले सैकड़ों वर्षों से अनेक पारकीय आक्रान्ताओं द्वारा इस भारत भू की जनता को बेतहाशा लूटा खसोटा जाता रहा, और वह निरीह द्रोपदी सी भगवान् भरोसे अपने इस राष्ट्र के तमाम शूरवीरों की ओर कातर दृष्टि से, उसी प्रकार निहार रही थी, जैसे कभी भरी सभा में द्रोपदी ने विश्वविजेता का दंभ रखने वाले अपने शूरवीर पतियों की ओर निहारा था; परन्तु उन सभी शूरवीरों की गर्दनों का बोझ उनके कंधे ही  नहीं सम्हाल पा रहे थे | ऐसे में एक आशा की किरण दिखाई दी कि अब भारत स्वतंत्र होगा, यहाँ धर्म का शासन होगा, धर्मराज युधिष्ठिर का शासन होगा; परन्तु नियति को तो कुछ और ही मंजूर था | अचानक सत्ता के दो केंद्र प्रगट हो गए दुर्योधन (जिन्ना) और पांडव (नेहरू) | जिन्ना ने कहा कि हम हिन्दुओं के साथ नहीं रह सकते अतएव राष्ट्र का विभाजन चाहिए | तत्कालीन पितामह (महात्मा गांधी) ने आश्वस्त किया कि राष्ट्र का विभाजन नहीं होगा, यदि होगा तो उनकी लाश पर होगा | पांडव पक्ष(हिन्दू) आश्वस्त हो गए, क्यों कि वही पितामह का सम्मान करते और उनसे स्नेह रखते थे; लेकिन पितामह(गांधीजी) तो दुर्योधन (जिन्ना)  की जिद के समक्ष विवश थे और धर्म के आधार पर राष्ट्र का विभाजन हो गया | इन शासकों (कौरवों) की जिद और उनके आधीन व्यवस्था (दु:शासन) ने द्रोपदी(प्रजा) का खूब चीर हरण किया, लाखों निरपराध लोगों की हत्या की गई, करोड़ों बेघर हो गए, फिर भी भारत में समस्या जस की तस रही | कौरवों का साथ देने के कारण पितामह को अपने प्राण देने पड़े थे, और उनका बध पांडवों ने किया था यहाँ भी गांधी की हत्या हुई, और हत्या करने वाला पांडव (हिन्दू) था | जनता ने सोचा कि चलो अब चैन से रहेंगे, अब तो धर्म का शासन स्थापित हो गया, अब तो द्रोपदी का चीर हरण नहीं होगा | परन्तु राज्य सिंघासन तो उस शांतनु का था, जिसने अपने सुख के लिए अपने ही युवा पुत्र देव व्रत को उसके अधिकारों से वंचित कर दिया था, उससे धर्मराज्य की अपेक्षा ही गलत थी; यह सिंघासन का ही प्रभाव था की सत्ता पाते ही घोटालों का खेल प्रारम्भ हो गया | सत्तासीन प्रधान (नेहरू) कब पांडव से दुर्योधन बन गया जनता (द्रोपदी) को पता ही नहीं चला | जीप घोटाले से प्रारम्भ हुआ चीर हरण लाखों करोड़ के घोटालों तक पहुँच गया | इन सत्ताधीशों को जनता (द्रोपदी) के तनपर सज्जित लज्जा वसन बोझिल लगने लगे धीरे धीरे व्यवस्था (दु:शासन) द्वारा उन्हें खींचा गया (सार्वजनिक शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा, सुरक्षा, पेंशन आदि) और दरबारियों (जनप्रतिनिधियों) के तन पर रत्नजडित आभूषण (असीमित अधिकार, विभिन्न श्रेणी की सुरक्षा, स्वास्थ, विकास निधि, आजन्म पेंशन, आदि आदि) सजने लगे | सामान्य जनता और गरीब (द्रोपदी लगभग निर्वसना) होती गई और जनप्रतिनिधि सहित व्यवस्था में भागीदार नौकरशाह और बड़े व्यापारी संपन्न से अति संपन्न होते चले गए | जनता कातर दृष्टि से देख रही थी कि, कोई गांडीवधारी, कोई गदाधारी उसकी अस्मिता की रक्षा के लिए आगे आए, तभी २०१४ के चुनाव में नरेंद्र मोदीजी के रूप में जनता को गांडीवधारी अर्जुन की छवि दिखाई दी और उसने उल्लासित होकर उन्हें विजय तिलक लगा कर प्रचंड बहुमत का अमोघ अस्त्र देकर दुर्योधन से संघर्ष के लिए बड़ी आशा और अपेक्षा के साथ अग्रसित किया | मोदीजी ने आश्वस्त भी किया था, कि जनता से लुटे एक एक पैसे का हिसाब लुटेरों से लेंगे और उन्हें दण्डित करेंगे, मात्र सौ दिनों में विदेशों में जमा काले धन को देश में ले आएँगे, यह धन इतना होगा कि यदि लोगों के खातों में डाला जाय तो प्रत्येक खाते में १५ लाख रु आ सकेंगे | जनता (द्रोपदी) के तन पर फिर से गरिमा युक्त परिधान होंगे | अपने वादे के अनुरूप उन्होंने कार्य करने का प्रयाष भी किया, विभिन्न योजनाओं द्वारा (जन धन योजना, आवास योजना, उज्वला योजना, आदि) के द्वारा निर्वसना द्रोपदी को लज्जा ढकने योग्य वस्त्र पहनाने का प्रयास किया है | उन्होंने नोट बंदी कर युद्ध छेड़ दिया, विदेशों से संपर्क कर काले धन के खातेदारों के नाम भी प्राप्त किये, जिस प्रकार पहले अर्जुन ने यह समझने में भूल की थी, कि उसका युद्ध केवल कौरवों से होगा; परन्तु युद्धक्षेत्र में देखा तो सभी बन्धु-बांधव युद्ध के लिए तत्पर थे, तब उन्हें मोह हो गया और कृष्ण से कहा कि में इनसे युद्ध नहीं करूंगा, इन अपनों को मारकर मुझे स्वर्ग का राज्य भी नहीं चाहिए | उसी प्रकार कौन्तेय (मोदीजी) को एक बार फिर मोह हो गया | जब नोट बंदी में काले धन के कुबेरों पर नजर पडी तो, वहां सब अपने बन्धु बांधव ही थे, अपनी ही पार्टी के लोग थे, विदेशी खातों में भी इन्ही अपनों को ही पाया, जीजाजी के जमीन घोटाले की जांच बढी, तो पता चला अपने ही करीबी भी इस गोरख धंधे में लगे हुए हैं, ऐसे में शव्य्शाची किस प्रकार अपनों पर ही प्रहार करते, अतएव अपने अस्त्र शस्त्र एक ओर रख कर किंकर्तव्यविमूढ़ हो कर बैठ गए | जब और गहराई से देखा तो ललित मोदी, मेहुल चौकसी, नीरव मोदी, अम्बानी, अडानी आदि सब अपने ही गुजरात के दिखे, विजयमाल्या अपनी ही पार्टी का दिखा, ऐसे में इनका बध करके शासन कैसे कर पाएंगे ? अगले चुनाव में करोड़ों के मंच कौन बनवाएगा ? दुर्भाग्य है कि वहां कोई मधुसूदन नहीं मिला, जो गीता का उपदेश देकर उन्हें कर्तव्य बोध कराता |
महाभारत में दुर्बुद्धि दुर्योधन सर्वथा अयोग्य एवं अहंकारी था, और पांडव कहीं योग्य एवं विनम्र थे अतएव सम्पूर्ण कौरव पक्ष किसी प्रकार पांडवों को मार्ग से हटाना चाहता था, इसके लिए समय समय पर षड्यंत्रों का सहारा लिया गया, कभी लाक्षा गृह में जलाकर मारने का प्रयास किया, तो कभी महा क्रोधी दुर्वासा ऋषि को, अति विपन्नता में गुजारा कर रहे पांडवों का आतिथ्य लेने भेजा आदि | ठीक उसी प्रकार आज भी दुर्बुद्धी एवं अहंकारी दुर्योधन (राहुल गांधी) और समस्त कौरव पक्ष (विपक्ष) अपने को अर्जुन (मोदीजी) के समक्ष असमर्थ और असहाय पा रहे हैं, इसलिए उनकी हत्या करने या अपध्स्त करने के लिए विभिन्न प्रकार के षड्यंत्र रच रहे हैं, कभी मणि शंकर एयर पाकिस्तान से मोदीजी को हटाने में सहायता मांगते हैं, तो कभी भीमा कोरेगांव जैसे षड्यंत्र रचे जाते हैं | यह सत्य है कि आज के अर्जुन (मोदीजी) ने मोह के वशीभूत होकर अपने अस्त्र रख दिए हैं और आजतक किसी भी भ्रष्टाचारी के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की है; परन्तु अभी युद्ध छोड़ा नहीं है, सम्पूर्ण विपक्ष एवं सरकार के भ्रष्टाचरियों को निरंतर भय है, कि कहीं उन्हें कर्तव्य बोध न हो जाए, और वे युद्ध के लिए सन्नद्ध हो जाएं, उस स्थिति में इन सभी पापियों का सुरक्षित ठिकाना कारागृह होगा; अतएव ये सभी मिलकर या तो षड्यंत्र द्वारा उनकी हत्या करवा देना चाहते हैं, या अनर्गल प्रलाप कर और झूठे अप्रमाणिक आरोप लगा कर द्रोपदी को भ्रमित कर, उसे ही अर्जुन से विमुख करना चाहते हैं | यदि द्रोपदी स्वयं अपने तारनहार अर्जुन (मोदीजी) पर अविश्वास कर कौरवों की गोद में बैठ जाती है, तो यह धर्मयुद्ध स्वतः समाप्त हो जाएगा और पुनः कौरवों का नंगा नाच प्रारम्भ हो जाएगा ( लाखों करोड़ के घोटाले, भगवा आतंकवाद, लक्षित हिंसा अधिनियम आदि) |
आज कांग्रेस अध्यक्ष (दुर्योधन) जब मोदीजी को चोर कहता है, तो वह वास्तव में मोदी (पांडव पक्ष) का उपहास उड़ाता है, अट्टहास करता है, और जनता (द्रोपदी) को बताना चाहता है कि देखो तुम्हारे इस तारनहार अर्जुन को हमने अपनी व्यवस्था का दास बना लिया है, जब वह बगैर किसी प्रमाण के कहता है कि राफेल सौदे में भृष्टाचार हुआ है, तो जनता को बताना चाहता है, कि सत्ता दुर्योधन है, जो भी सत्ता में रहेगा, वह वैसा ही करेगा जैसा हमने किया | और बताना चाहता है कि, सभी पांडव सामूहिक रूप से राजनीति के द्यूत में द्रोपदी (जनता) को हार चुके हैं | अब यह द्रोपदी हमारी (शासकों) दासी है | इसका चीर हरण केवल हम ही नहीं हर शासक करेगा, वैसे भी जिस दिन इसे पाँचों भाइयों में बाँट लिया था; इसका चीर हरण तो उसी दिन हो गया था | आज स्थिति यह है कि प्रत्येक छोटा बड़ा दरवारी (जनप्रतिनिधि) घूसखोरी, कमीशनखोरी, कालाबाजारी, आदि तमाम अनैतिक व्यवस्थाओं (दु:शासन) की सहायता से इस निर्वसना द्रोपदी (निरीह जनता) को अपनी गोदी में बिठाने (वोट लेने ) के लिए अपनी अनावृत जंघा (सर्वविदित अनैतिक, अनाचारी व्यवहार) को पीट रहा है, और यह जनता अपने रक्षकों (पतियों) की कायरता से निराश किसी अलौकिक शक्ति (कृष्ण) की आश लगाए बैठी है, जो हर समय नहीं प्रगट होती है, अतएव अत्याचारी और भृष्ट कौरवों के तांडव से बचने के लिए, पुनः अपने अर्जुन पर ही भरोषा करना पड़ेगा | 

गुरुवार, 24 मार्च 2016

लोकतन्त्र के मंदिर


विश्व की प्रत्येक सभ्यता में एक ऐसे पवित्र उपासना स्थल की कल्पना की गई है, जहाँ साक्क्षात ईश्वर का वास होता है, और यहाँ किसी भी प्रकार का अनैतिक कार्य करना वर्जित है, और यदि उस उपासना स्थल पर किसी से कोई अनैतिक कृत्य हो ही जाय, तो उसे दण्डित करना और उस स्थान को पुनः पवित्र कर उस ईष्ट की पुनः प्राण प्रतिष्ठा करना आवश्यक है अन्यथा वह स्थान अपवित्र एवं अपूज्य माना जाता है, लगभग सभी सभ्यताओं में इस प्रकार की परिपाटी है | भारत में इसे मंदिर कहा गया है; मंदिर में प्रगट या अप्रगट रूप से उस समुदाय के आराध्य का स्थान होता है | एक लम्बी दासता के उपरान्त जब भारत बाह्य शक्तियों की दासता से मुक्त हुआ, तब यहाँ २६ जनवरी १९५० को गणतंत्र की स्थापना की गई, और लोकसभा, राज्यसभा, विधान सभा आदि के रूप में लोकतंत्र के नए मंदिरों की स्थापना हुई, जिनमें लोकतंत्र के संविधान की पवित्रता को बनाए रखते हुए, जनहित के कार्यों का निष्पादन पूर्ण निष्ठां एवं ईमानदारी से हो ऐसी अपेक्क्षा की गई है | इन मंदिरों में जनता द्वारा चयनित निष्ठावान, चरित्रवान, राष्ट्रभक्त, आ सकें ऐसी व्यवस्था की गई थी; कोई अपराधी, विक्षिप्त या राष्ट्रद्रोही इन मंदिरों की पवित्रता को नष्ट न कर सके इसकी भी व्यवस्था की गई थी | प्रारम्भ में इन मंदिरों में पूर्ण निष्ठां एवं ईमानदारी के साथ जनहित के कार्य होते हुए दिखाई भी दिए; परन्तु कुछ अंतराल के पश्चात ही यहाँ चयनित होकर आने वाले जनप्रतिनिधियों पर सत्ता का ऐसा मद चढने लगा कि शनै: शनै: उन्होंने किसी भी प्रकार सत्ता सुख भोगते हुए, तमाम तरीके के अनैतिक कार्यों को यहाँ से निष्पादित करना प्रारम्भ कर दिया, और तो और सर्वथा अयोग्य, भृष्ट, एवं अपराधी लोग भी विभिन्न प्रकार के अनुचित साधनों द्वारा यहाँ चयनित हो कर आने लगे | आज ये मंदिर जनतंत्र की उपासना के योग्य न रहकर, विभिन्न प्रकार के अपराधियों के सुरक्षित अड्डे बन चुके हैं |  स्थान कितना भी पवित्र हो; यदि उस स्थान में अपराधी और व्यभिचारी अपना अड्डा बना लें, तो उस स्थान की पवित्रता को पुनर्स्थापित करने के लिए उन अपराधियों को निकालना आवश्यक है, फिर चाहे इसके लिए उस स्थान को ही क्षति पहुंचानी पड़े |
३१ अक्टूबर १९८४ को भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंद्रा गांधी की नृशंश हत्या के पश्चात, जिस प्रकार ३ नवम्बर १९८४ तक सम्पूर्ण राष्ट्र में खुले आम सरकार समर्थित गुंडों द्वारा सिक्ख समुदाय का कत्ले आम किया गया, उन्हें जिन्दा जलाया गया, उनकी महिलाओं के साथ पहले अनाचार फिर हत्या कर जला दिया गया, उनके घरों-दुकानों को लूटा गया, जलाया गया, सरकारी आंकड़ों के अनुसार २८०० से अधिक लोगों की हत्या कर दी गई थी, जिसमें से २१०० से अधिक लोग केवल दिल्ली में मारे गए थे | सरकारी सुरक्क्षा बल अपने सामने यह सब न केवल होने दे रहे थे, अपितु स्वयं लूट में सम्मिलित थे, तथा सरकार समर्थित उन गुंडों और हत्यारों का सहयोग भी कर रहे थे; इन गुंडों और हत्यारों में कई उस समय जन प्रतिनिधि भी थे | आज इस घटना को हुए ३० वर्ष से अधिक हो गए; परन्तु किसी भी ऐसे जनप्रतिनिधि को, जो इस हत्या काण्ड में सम्मिलित था, अभी तक कोई दंड नहीं दिया गया है, दण्डित करना तो बहुत दूर की बात है ‘ जब कोई बड़ा पेड गिरता है, तो धरती कांपती है’ कह कर इस नरसंघार को समर्थन देने वाले को भारत रत्न से सम्मानित कर दिया जाता है; तब भी इन लोकतंत्र के मंदिरों में बैठने वाले सभी प्रतिनिधियों का एक ही उत्तर होता है, कोई बख्शा नहीं जाएगा और क़ानून अपना कार्य करेगा |
इसी प्रकार २-३ दिसंबर १९८४ की रात्रि को भोपाल स्थित युनियन कार्बाइड के कारखाने में दुर्घटना घटी और उस त्रासदी में पहले चार-पांच दिनों में ८००० से अदिक लोग काल के गाल में समा गए, एक माह से कुछ अधिक व्यतीत होते होते ८००० से अधिक और कालकलवित हो गए, बीसों हजार लोग विभिन्न प्रकार की गंभीर बीमारियों से ग्रसित होकर भयंकर पीड़ा झेलते हुए, मृत्यु की प्रतीक्षा करने को विवश थे | ऐसे में उस कारखाने के मालिक वारेन एंडरसन को पकड़ कर इन लोगों को समुचित मुआवजा दिलवाना, जो अनाथ हो गए थे उनके भविष्य के जीवनयापन की समुचित व्यवस्था करवाना, जो गंभीर रोगों से पीड़ित हुए थे, उनके निःशुल्क समुचित उपचार की व्यवस्था करवाना, उस समय की सरकार का उत्तरदायित्व था; परन्तु वैसा कुछ भी नहीं हुआ; अपितु उसे पूर्ण सुरक्षित मार्ग दे कर यहाँ से पलायन करवा दिया गया | इसके पश्चात कई बार सरकारें बदलीं लेकिन, मानवता के दुश्मन इन अपराधियों पर किसी प्रकार की कोई कार्यवाही ३० वर्ष से अधिक का समय बीत जाने पर भी आज तक नहीं हुई | इस प्रकार हम देखें तो तमाम अपराधों में इन तथाकथित लोकतंत्र के मंदिरों में बैठने वाले सभी जनप्रतिनिधि बराबर के अपराधी हैं; अतएव यह सुनिश्चित होता है कि ये लोकतंत्र के मंदिर नहीं अपितु गंभीर अपराधियों के अड्डे बन गए हैं |
अभी अभी कुछ दिनों पूर्व पता चला कि जनता की गाढी कमाई का केवल सरकारी बैंकों का साढ़े तीन लाख करोड़ से अधिक धन एन.पी.ए. है; जिसके वापस आने की संभावना नहीं के बराबर है | इसके अतिरिक्त बी.जे.पी. समर्थित एक राज्यसभा सांसद विजय माल्या सरकारी बैंकों का ९००० करोड़ से अधिक धन लेकर २ मार्च २०१६ को सुरक्क्षित भारत से सफलता पूर्वक भाग गया या भगा दिया गया और अब उसे वापस पकड कर लाने का दिखावा कर उसी प्रकार जनता को मूर्ख बनाया जा रहा है, जैसा कि ललित मोदी के मामले में बनाया गया था | यह तो सरकारी बैंकों के आंकड़े हैं; यहाँ कम से कम आम जनता का धन डूबा तो नहीं है, सरकार उसे वापस करेगी ऐसी अपेक्षा है | परन्तु उन निजी बैंकों, चिटफंडो और सहकारी बैंकों का क्या ? जिनसे हजारों करोड़ का उधार इन माननीयो एवं अन्य प्रभावशाली लोगों ने लिया; परन्तु वापस करने से इनकार कर दिया | उसके पश्चात उनका पंजीकरण भारतीय रिजर्व बैंक ने निरस्त कर दिया | इस प्रकार के उधार में रिजर्व बैंक के अधिकारी, उस बैंक के अधिकारी तथा प्रभावशाली उधार लेने वाले ये आर्थिक अपराधी मिले हुए होते हैं और सामान्य जनता का पैसा हजम कर जाते हैं | पहले रिजर्व बैंक के भृष्ट अधिकारी इन बैंकों, चिटफंडो को लाइसेंस देने में मोटी रकम खाते हैं; आम जनता समझती है कि ये बैंकें, रिजर्व बैंक एवं भारत सरकार की निगरानी में कार्य कर रहीं हैं अतएव उनका धन उतना ही सुरक्क्षित है, जितना सरकारी बैंकों में; परन्तु घोटाला होने के पश्चात पता चलता है कि इन सभी संस्थाओं की जिम्मेदारी केवल कमीशन खाने तक थी; और जनता की जीवन भर की गाढी कमाई एक झटके में डूब जाती है | अपना स्वयं का धन होने पर भी, जमाकर्ता एक एक पैसे को मोहताज होकर, खून के घूँट पीकर रहने को विवश होता है; और ऋण लेने वाले ये माननीय इन तथाकथित मंदिरों में सुरक्षित बैठ कर राष्ट्र भक्ति, ईमानदारी आदि की बड़ी बड़ी बातें करते हैं | यदि किसी फलदार वृक्ष में कीड़े लग जाएं और सभी फलों को चट कर जाएं, तो एक एक कीड़े को नहीं मारा जाता है, अपितु पूरे वृक्ष पर ही कीटनाशक का छिडकाव करना पड़ता है | आज ऐसी ही स्थिति इस लोकतंत्र के वृक्ष की हो गई है, जिसमें जनता को मिलने वाले फल को, ये जनप्रतिनिधि, बड़े भृष्ट व्यापारी और बड़े माफिया मिलकर खा जा रहे हैं |
१३ अप्रैल १९१९ को अमृतसर के जलियाँ वाला बाग़ में शांतिपूर्ण ढंग से सभा कर रहे; निहत्थे लोगों पर जनरल डायर ने गोलियां चलवा दी थीं | जिसमें १५२६ से अधिक लोगों की मृत्यु हुई थी और ११०० से अधिक घायल हुए थे; उन मरने वालों में अमर शहीद ऊधम सिंह के पिता भी थे; लगभग २१ वर्ष पश्चात इंग्लैंड के कैक्सटन हाल में १३ मार्च १९४० को अपने पिता की मृत्यु का बदला लेते हुए, ऊधम सिंहजी ने १५२६ लोगों के हत्यारे जनरल डायर को गोलियों से भून दिया था | आज ३० वर्ष से अधिक व्यतीत होने पर भी सिक्खों के हत्यारे उन माननीयों का बाल भी बांका नहीं हुआ, इसी प्रकार भोपाल त्रासदी के अपराधियों को किसी प्रकार का दंड दिलवाने का अभी तक कोई प्रयाष ही नहीं किया गया है | लाखों लोगों की खून-पसीने की कमाई ये अपराधी हजम कर गए; ऐसे में जिनको किसी प्रकार की त्रासदी से नहीं गुजरना पड़ा है, और इस व्यवस्था की लूट का अंग बने हुए हैं; वे निश्चित राष्ट्र भक्ति की बड़ी बड़ी बातें कर सकते हैं; परन्तु जिनका सब कुछ इन अपराधियों ने लूट लिया है, और तीस वर्ष पश्चात भी कहीं से न्याय की आश नहीं है उन्हें तो निरंतर प्रतीक्षा रहेगी एक ऊधम सिंह की, जो इन हत्यारों से अगणित हत्याओं का बदला ले सके, एक भगत सिंह की जो इन बहरे कानों को सुनाने के लिए इन अपराधी अड्डों पर धमाके कर सके |

इस लोक सभा चुनावों के पश्चात स्वतंत्र भारत में प्रथम बार एक सांसद (श्री नरेन्द्र मोदी ) ने लोकतंत्र के मंदिर के बाहर सीढ़ियों पर बैठ कर पहले प्रणाम किया, फिर मंदिर में प्रवेश किया और आज वे ही इस सरकार के मुखिया भी हैं; उनसे लोक को बहुत आशा एवं अपेक्षाएं हैं, कि वे पुनः इस मंदिर की पवित्रता को स्थापित कर सकेंगे, और बगैर भेद-भाव के सभी अपराधियों को उचित दंड दिलवाने की व्यवस्था करेंगे | अन्यथा .......

मंगलवार, 1 मार्च 2016

अनैतिक

अनैतिक
९ फरवरी २०१६ को जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में जो कुछ हुआ, निश्चित वह घोर अनैतिक था | प्रषाशन के अनुसार उस दिन वहां की क्षात्र युनियन ने संसद पर हमले के दोषी अफ्जलगुरू की फांसी की वर्षगाँठ पर विरोध मनाते हुए यूनिवर्सिटी प्रांगण में घोर आपत्ति जनक राष्ट्रविरोधी नारे लगाए, जिसके अपराध में कन्हैया, खालिद आदि को राष्ट्रद्रोह के आरोप में बंदी बना लिया गया | इसके पूर्व इसी प्रकार की घटना हैदराबाद यूनिवर्सिटी में हुई थी, जिसमें पी.एच.डी. के क्षात्र रोहित और उसके साथियों को राष्ट्रविरोधी नारे लगाने के आरोप में दण्डित किया गया था, बाद में रोहित ने आत्महत्या कर ली थी | इन सभी घटनाओं ने मन को उद्वेलित कर दिया था, कि क्या वास्तव में ये उच्च शिक्षा के मंदिर राष्ट्रद्रोह के अड्डे बन गए हैं ? या बीमारी कुछ और हे, और ये लक्षण मात्र हैं |
कोई भी कृत्य, चाहे वह नैतिक हो या अनैतिक, कुकृत्य हो या सत्कृत्य, अनाचार हो या सदाचार, दुष्कर्म हो या सत्कर्म, पाप हो या पुण्य, राष्ट्रद्रोह हो राष्ट्रवंदन तीन प्रकार से ही किया जाता है और किया जा सकता है    १. मन से            २. वचन से         ३. कर्म से
कोई भी कृत्य पहले मन से, फिर वचन से अर्थात वाणी से और फिर कर्म से अर्थात कार्य रूप में परिणित किया जाता है | लेकिन यह नि:तांत आवश्यक नहीं कि जो मन से किया जाय, वही वचन से भी किया जाए और कर्म से भी किया जाए, अर्थात कोई व्यक्ति मन से कुछ, वचन से कुछ, तथा कर्म कुछ और कर सकता है | किसी के मन में क्या चल रहा है, यह समझ पाना शायद अति दुष्कर है; परन्तु वाणी और कृत्य ही प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं | यदि कोई व्यक्ति वचन से सत्कर्म की बड़ी बड़ी बातें करे, और कर्म घोर अनैतिक एवं निंदनीय हों (जैसा कि कई उपदेशकों, राजनेताओं, का देखने में आया है), तो उसे सत्कर्मी कहेंगे या दुष्कर्मी ? कुछ लोग ऐसे भी मिलते है, जिनके मुख से सदैव अभद्र भाषा ही निकलती है, लेकिन निश्छल ह्रदय एवं अति सदाचारी होते हैं | यदि राष्ट्रद्रोह के नारे लगाने वाले ये क्षात्र राष्ट्रद्रोही हैं, तो सत्ता में बैठे वे राजनेता, जो राष्ट्रप्रेम पर लम्बे लम्बे व्यक्तव्य देते हैं, प्रातः – सायं राष्ट्र वंदना भी करते हैं, लेकिन राष्ट्र के खजाने का अरबों रुपया गबन कर जाते हैं, क्या हैं ? राष्ट्रद्रोही नहीं हैं? वे ठेकेदार – इंजीनियर, जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए निम्न श्रेणी का निर्माण कार्य करते हैं, जिसके कारण बड़ी दुर्घटना घटती है और राष्ट्र की व्यापक क्षति होती है, वे क्या हैं? वे चिकित्सक जो सरकारी वेतन लेते हुए भी, रोगी को फीस की लालच में सरकारी चिकित्सालय में नहीं देखते, वे क्या हैं? जो भी कर्मचारी पूरा वेतन लेने के उपरान्त भी जन कार्य बगैर घूस के नहीं करता, वह क्या है? व्यापारी विभिन्न उपभोगता वस्तुओं में मिलावट कर, उपभोक्ताओं के जीवन से खिलवाड़ करता है, क्या यह राष्ट्रद्रोह नहीं है ? क्या केवल मुख से नारे लगाना ही राष्ट्रद्रोह है ? यदि नारे लगाने वालों के विरुद्ध राष्ट्रद्रोह का अभियोग लगाया जा सकता है, तो इन सभी लोगों के विरुद्ध क्यों नहीं? इतने राष्ट्रद्रोही जिस राष्ट्र में निर्द्वंद घूम रहे हों, वहां प्रतिक्रिया स्वरूप इस प्रकार के नारे लगना अस्वाभाविक नहीं है |
यह लोक तंत्र है अर्थात जनता की सरकार जनता के द्वारा जनता के लिए, ऐसा कहा जाता है, लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? जिस राष्ट्र में सामान्य नागरिक सदैव असुरक्षित हो; वहां नेता सरकारी सुरक्षा गार्डों की छाया में विभिन्न श्रेणी की सुरक्षा लिए रहते हों? जहां जन सामान्य बगैर चिकित्सा के तडप तडप कर जीवन समाप्त करने को विवश हो वहां जन प्रतिनिधियों को देश में ही नहीं विदेश में भी श्रेष्ठतम चिकित्सा उपलब्ध हो ? जहाँ की ४०% से अधिक जनसँख्या दोनों समय भर पेट निकृष्ट भोजन भी न पाते हों, वहीं उनके प्रतिनिधि मात्र ३० रु में सुस्वादु पौष्टिक भोजन करते हों ? जन सामान्य के लिए सस्ती शिक्षा की व्यवस्था बिगाड़ कर इन नेताओं, व्यापारियों एवं अपराधियों ने महंगी शिक्षा का ऐसा मकड़जाल रचा कि जन सामान्य लुटने के लिए विवश है | सामान्य जनता का परिश्रम से कमाया धन बैंकों में जमा किया जाता है और सरकार की सहमति से उस धन से अरबों रु. बड़े भृष्ट व्यापारी और नेता उधार लेकर वापस नहीं करते, ऐसे में अपना धन होने पर भी सामान्य व्यक्ति धनाभाव में जीवन व्यतीत करने को विवश होता है; जीवन के हर क्षेत्र में मची लूट के कारण, जहां जन सामान्य निरीह एवं विवश है, वहां इस लोकतंत्र के विरुद्ध आक्रोश उत्त्पन्न होना स्वाभाविक है, अतएव यह समझना कठिन है कि अफ्जलगुरू ने संसद पर हमला किया था, या इन ऐयाश भ्रष्ट एवं राष्ट्रद्रोही सांसदों पर ? 
कई बार कोई कुकृत्य जो हमें जैसा दिखाई पड़ता है, वैसा होता नहीं है, इस विषय में एक छोटी सी घटना उल्लिखित कर रहा हूँ, यह न तो काल्पनिक है, न कहानी है, यह वास्तविक है | मेरे एक सहयोगी थे केंद्र सरकार के कार्यालय में अधिकारी थे, उन्होंने बताया था कि उनके अधीनस्थ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी इतने चोर प्रतीत हुए कि कोई भी छोटा से छोटा सरकारी सामान, (उपकरणों में लगने वाला बिजली का तार, ताला, पेचकस आदि) पलक झपकते गायब हो जाता ; एक - दो माह में ही वे परेशान हो गए, नया सामन खरीदा और गायब, अब तत्काल दूसरा सामन कैसे खरीदें ; परन्तु इसमें एक विशेष बात यह थी, कि व्यक्तिगत सामन चोरी नहीं होता था | उन्होंने एक प्रयोग किया, काफी समय वे अपना कार्यालय छोड़ कर, अधीनस्थ कर्मचारियों के मध्य बैठने लगे, और बाजार से कार्यालय का सभी सामान स्वयं न लाकर उन्ही से मंगवाने लगे ( दूकाने निश्चित थीं, जहां कोई हेराफेरी नहीं होती थी ), और तो और अपनी अलमारी से रूपये भी स्वयं न निकाल कर उन्ही से निकलवाते और बचा धन तथा रसीदें भी उन्ही से रखवाते और लगभग आठ वर्षों में एक भी रु की गड़बड़ी नहीं हुई | कुछ ही दिनों में सब कुछ बदल गया, अब कोई सामान गायब नहीं होता था, इसका तात्पर्य वे चोर नहीं थे; वह केवल प्रतिक्रिया थी; जैसे ही उन्हें विश्वाष हुआ कि उनका अधिकारी भृष्ट नहीं है, तो उन्होंने भी पूर्ण सहयोग दिया था | बहुत पुरानी बात नहीं है, भारत के प्रधानमंत्री लालबहादुर शाश्त्री ने सपरिवार स्वयं सप्ताह में एक दिन का उपवास रखते हुए, राष्ट्र से एक दिन का उपवास करने का आग्रह किया था, और आश्चर्य जनक रूप से घरों की बात तो छोडिये होटल भी स्वेक्षा से बंद होते थे |

केवल नैतिक होना ही पर्याप्त नहीं है नैतिक दिखना भी चाहिए | जब तक जनतंत्र में जन उपेक्षित रहेगा और भृष्ट, दुराचारी, अनाचारी नेता जनप्रतिनिधि रहेंगे | भृष्ट कर्मचारी, अपराधी, मिलावटखोर व्यापारी और नेताओं का गठबंधन रहेगा, तब तक इस प्रकार के नारे भी जीवित रहेंगे और राष्ट्रद्रोहितापूर्ण दिखने वाले कृत्य भी; परन्तु वे कृत्य राष्ट्रद्रोह पूर्ण हो आवश्यक नहीं, वे इस भृष्ट व्यवस्था के विरुद्ध हो सकते हैं; वास्तव में राष्ट्रद्रोही ये विरोध प्रदर्शन करने वाले नहीं; अपितु ये राजनेता, माफिया, और मिलावटखोर भ्रष्ट व्यापारी एवं कर्मचारी हैं और दंड के वास्तविक पात्र भी यही लोग हैं |

सोमवार, 31 अगस्त 2015

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक मिथक


      भारत ईश्वरीय अनुकम्पा से परिपूर्ण एक ऐसा महान राष्ट्र है, जहाँ संकट के समय वह स्वयं अवतरित होता है | जब जब इस राष्ट्र पर चतुर्दिक आपदा आई तब कभी राम तो कभी कृष्ण अवतरित हुए, जब यहाँ हिंसा और अस्पृश्यता का नग्न तांडव हो रहा था तो एक ही समय भगवान् गौतम बुद्ध और भगवान् महावीर का प्रादुर्भाव हुआ जिसने न केवल भारत, अपितु सम्पूर्ण मानवता के घावों पर ओषधि लगाने का कार्य किया एवं एक कालजयी मार्ग प्रसस्त किया; इसी प्रकार जब मुग़ल आक्रान्ता अकबर द्वारा समस्त हिन्दू समाज का क्षद्म सहिष्णुता की आड में धर्मान्तरण किया जा रहा था और उनकी तीर्थ यात्राओं पर जबरन कर वसूला जाता था, तब इस समाज का मार्ग दर्शन करने एक साथ कबीर, सूर, तुलसी, मीरा जैसी नित्य वन्दनीय विभूतियों का अवतरण हुआ और मुग़ल दासता से मुक्त कराने हेतु वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का निरंतर संघर्ष भयभीत हिन्दू समाज के लिए एक संबल बना रहा था| जब औरंगजेब का क्रूर शाषन इस राष्ट्र पर अत्याचार कर रहा था, और बलात धर्मांतरण कराया जा रहा था, तब उसका प्रतिकार करने एक ही समय गुरू तेगबहादुर, वीर शिवाजी महाराज, वीर वर दुर्गादास, गुरू गोविन्द सिंहजी महाराज जैसी महान विभूतियों का प्रागट्य हुआ | जब यह राष्ट्र आपसी वैमनस्यता और फूट के कारण कुटिल अंग्रेजों की दासता की बेड़ियों में जकड़ा, उन्हें तोड़ने को कसमसा रहा था तब सुभाष, चन्द्रशेखर , भगत सिंह, वीर सावरकर, महात्मा गांधी जैसे सहस्त्रावधि स्वतंत्रता सैनानियों का जन्म हुआ तो यहाँ व्याप्त बुराइयों का प्रतिकार करने महान चिन्तक डा. हेडगेवार और डा. आंबेडकर जैसे युगदृष्टाओं का जन्म हुआ, जिन्होंने समग्र हिन्दू समाज के एकीकरण में अतुलनीय योगदान किया है |
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्म डा. हेडगेवार द्वारा १९२५ में अत्यंत सादगी पूर्ण तरीके से, बगैर किसी आडम्बर के निःष्कपट तरीके से एक छोटे परन्तु अत्यंत मत्वपूर्ण उद्द्येश्य की पूर्ती के लिए हुआ था | उद्येश्य था समग्र हिन्दू समाज (हिन्दू कोई धर्म या मत नहीं, अपितु एक जीवन पद्धति है जिसमें एक ओर अहिंसा परमो धर्मा है तो दूसरी ओर शठे प्रति शाठ्ये है, यही पद्धति कहती है “सर्वे भवन्तु सुखिनः”) को बगैर किसी प्रकार के भेद भाव के (विभिद उपासना पद्धतियों, जातियों, उप जातियों, वर्ण, राजनैतिक भिन्नता, मत-मतान्तरो, आर्थिक, सामजिक विभेदों का ध्यान किये बगैर) संगठित करना और अपने पूर्व गौरव तथा सदाचरण को स्मरण करते हुए, इस राष्ट्र को परम वैभव प्रदान करना, जितना सहज और सरल इसका जन्म था, उतनी ही सहज और सरल इसकी कार्य पद्धति भी है | २४ घंटे में निश्चित समय पर मात्र एक घंटे की प्रतिदिन शाखा, जिसमें विभिन्न शारीरिक व्यायाम, पूर्ण अनुशाषन में रहते हुए सदाचारिता के साथ करना और “तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें” जैसे गीतों द्वारा माँ भारती की वंदना करना और अंत में माँ भारती की प्रार्थना करना | संघ का मानना है यदि व्यक्ति निर्माण हुआ तो उससे समाज और समाज से राष्ट्र निर्माण स्वतः होगा | परन्तु विडंबना है कि अधिकाँश लोग, जो इतने सहज नहीं होते, संघ के इस सरल कार्य को भी शंसय की दृष्टि से देखते हैं; इसमें उनका कोई दोष नहीं हैं निरंतर चतुर्दिक सामाजिक कुरीतियों और कुटिलताओं से घिरे किसी भी व्यक्ति को सहज ही किसी की सहजता पर तत्काल विश्वास नहीं होगा | संघ को समझने के लिए निरंतर समर्पण भाव से उसके सानिद्ध्य में आना होगा | संघ के विषय में अनेकानेक भ्रान्तियां है कि संघ यह करता है, संघ वह करता है| यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि संघ केवल और केवल निःस्वार्थी, सदाचारी, राष्ट्रभक्त व्यक्तियों का निर्माण करता है, यह एक विद्यालय मात्र है| यहाँ से निकले व्यक्ति अपने अपने तरीके से राष्ट्र और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी अपनी सामर्थ्य और योग्यता के अनुसार कार्य करते हैं| ऐसा नहीं है कि संघ के लोगों में विकार नहीं हैं, या दोष नहीं हैं| संघ की शाखा में मात्र एक घंटे आने वाला व्यक्ति शेष २३ घंटे उसी कलुषित वातावरण में रहता है, जिसमें सामान्य व्यक्ति की बात तो क्या, वल्कल वस्त्रधारी सन्यासी भी विकारों में लिप्त पाए जाते हैं; तो निःश्चित उस वातावरण का प्रभाव भी उस पर रहेगा, फिर शाखा में कितना समर्पण रहता है, कितने दिन आता है, इन सबका प्रभाव भी रहता है| किसी अच्छे से अच्छे विद्यालय में भी क्या सभी क्षात्र अच्छे निकलते हैं? एक ही अध्यापक द्वारा पढाए क्षात्रों में योग्यता और आचरण भिन्न भिन्न पाया जाता है, परन्तु केवल अच्छे क्षात्र के प्रदर्शन का श्रेय उस संस्थान और उस आचार्य को जाता है| आप अब से पचास वर्ष पूर्व के हिन्दू समाज का स्मरण करें, जब वह इतना हतोत्साहित और खिन्न था कि स्वयं को हिन्दू कहलाने में अपमानित अनुभव करता था, आज वही समाज अपने को गौरवान्वित अनुभव करता है, आज अनेकानेक सन्यासी जो अस्पृश्यता के विरुद्ध खड़े दिखाई देते हैं और आदिवाषी, वनवासी, एवं इस प्रकार के अभावग्रस्त लोगों के मध्य कार्य करते दीखते हैं, वह कहीं न कहीं संघ जैसी संस्थाओं का अपरोक्ष अथवा परोक्ष प्रभाव ही है|
इस समय इस राष्ट्र में प्रतिदिन ५१००० से अधिक दैनिक शाखाएं लग रही हैं, जिनमें व्यक्ति निर्माण का निरंतर प्रयास किया जाता है, संघ शाखाओं पर आने वाले स्वयंसेवक किसी प्रकार के भय या लालच के वशीभूत हो कर नहीं आते , अपने सीमित साधनों से अपना और परिवार का भरण-पोषण करते हुए, अपना धन एवं समय दे कर संघ का कार्य करते हैं | जहां सामान्य व्यक्ति कोई भी कार्य किसी न किसी लाभ की अपेक्षा से करता है, यहाँ तक कि वैरागी सन्यासी भी अपनी ख्याति और चरण वंदना का लोभ अपने मन में रखते हैं ; वहीं संघ का स्वयमसेवक सभी प्रकार की इक्षाओं को त्याग राष्ट्रोत्थान के लिए समर्पित रहता है | ऐसे देवदुर्लभ कार्यकर्ता एक दिन में नहीं बनते , सतत प्रयास किया जाता है , अपनी ९० वर्ष की इस सतत यात्रा में कई झंझावातों को सहते हुए संघ ने अनगिनत ऐसे हीरे तराश कर इस राष्ट्र की सेवा में समर्पित किये हैं , जिनके निःस्वार्थ समर्पण और त्याग के समक्ष किसी का मस्तक भी स्वतः झुक जाएगा | प्रातः वन्दनीय, एकनाथजी रानाडे जिन्होंने विवेकानंद स्मारक की स्थापना की, सदा शिव गोविन्द कात्रे, जिन्होंने भारतीय कुष्ठ निवारक संघ की स्थापना की, पंडित दीन दयालजी उपद्ध्याय, जिन्होंने अन्त्योदय का विचार राष्ट्र को दिया, नानाजी देशमुख, जिन्होंने चित्रकूट में ऐसा कार्य खडा किया कि आस-पास के ग्रामीण बन्धु स्वावलंबी हो सके, भारतीय मजदूर संघ के प्रणेता दत्तो पंतजी ठेंगणी आदि अनेक ऐसे नगीने ,जिनके कार्य से हम उन्हें जानते हैं ; परन्तु वे मूर्धन्य कार्यकर्ता जिन्होंने इनको तराश कर इस योग्य बनाया ऐसे सैकड़ों समर्पित कार्यकर्ताओं के नाम कौन जानता है | यही संघ की परिपाटी है और यही कार्य पद्धति |

जनमानस को संघ से असीमित अपेक्षाएं हैं , संघ का सामर्थ्य सीमित है, क्योंकि जिस समाज से संघ को स्वयंसेवकों की पूर्ती होती है, वहां निरन्तर मानवीय एवं नैतिक मूल्यों का पतन होता जा रहा है ऐसे में संघ भी उस प्रदूषण से बच नहीं सका है, विशेष रूप से जबसे इसे राजनैतिक संबल प्राप्त हुआ है, इसके मूल्यों में गिरावट आई हुई दिखती है और ऐसे में जब मानस की अपेक्षाएं उनकी इक्षानुरूप पूर्ण नहीं होती तो संघ के कार्यकर्ता की छोटी से छोटी भूल पर उन्हें क्षोभ होता है और अपना स्नेह गुस्से के रूप में संघ पर उतारते हैं , यही क्रोध संघ को संबल प्रदान करता है , और उसे भरोसा दिलाता है, कि समस्त हिन्दू समाज उसकी ओर आशा भरी दृष्टि से निहार रहा है |