गुरुवार, 24 मार्च 2016

लोकतन्त्र के मंदिर


विश्व की प्रत्येक सभ्यता में एक ऐसे पवित्र उपासना स्थल की कल्पना की गई है, जहाँ साक्क्षात ईश्वर का वास होता है, और यहाँ किसी भी प्रकार का अनैतिक कार्य करना वर्जित है, और यदि उस उपासना स्थल पर किसी से कोई अनैतिक कृत्य हो ही जाय, तो उसे दण्डित करना और उस स्थान को पुनः पवित्र कर उस ईष्ट की पुनः प्राण प्रतिष्ठा करना आवश्यक है अन्यथा वह स्थान अपवित्र एवं अपूज्य माना जाता है, लगभग सभी सभ्यताओं में इस प्रकार की परिपाटी है | भारत में इसे मंदिर कहा गया है; मंदिर में प्रगट या अप्रगट रूप से उस समुदाय के आराध्य का स्थान होता है | एक लम्बी दासता के उपरान्त जब भारत बाह्य शक्तियों की दासता से मुक्त हुआ, तब यहाँ २६ जनवरी १९५० को गणतंत्र की स्थापना की गई, और लोकसभा, राज्यसभा, विधान सभा आदि के रूप में लोकतंत्र के नए मंदिरों की स्थापना हुई, जिनमें लोकतंत्र के संविधान की पवित्रता को बनाए रखते हुए, जनहित के कार्यों का निष्पादन पूर्ण निष्ठां एवं ईमानदारी से हो ऐसी अपेक्क्षा की गई है | इन मंदिरों में जनता द्वारा चयनित निष्ठावान, चरित्रवान, राष्ट्रभक्त, आ सकें ऐसी व्यवस्था की गई थी; कोई अपराधी, विक्षिप्त या राष्ट्रद्रोही इन मंदिरों की पवित्रता को नष्ट न कर सके इसकी भी व्यवस्था की गई थी | प्रारम्भ में इन मंदिरों में पूर्ण निष्ठां एवं ईमानदारी के साथ जनहित के कार्य होते हुए दिखाई भी दिए; परन्तु कुछ अंतराल के पश्चात ही यहाँ चयनित होकर आने वाले जनप्रतिनिधियों पर सत्ता का ऐसा मद चढने लगा कि शनै: शनै: उन्होंने किसी भी प्रकार सत्ता सुख भोगते हुए, तमाम तरीके के अनैतिक कार्यों को यहाँ से निष्पादित करना प्रारम्भ कर दिया, और तो और सर्वथा अयोग्य, भृष्ट, एवं अपराधी लोग भी विभिन्न प्रकार के अनुचित साधनों द्वारा यहाँ चयनित हो कर आने लगे | आज ये मंदिर जनतंत्र की उपासना के योग्य न रहकर, विभिन्न प्रकार के अपराधियों के सुरक्षित अड्डे बन चुके हैं |  स्थान कितना भी पवित्र हो; यदि उस स्थान में अपराधी और व्यभिचारी अपना अड्डा बना लें, तो उस स्थान की पवित्रता को पुनर्स्थापित करने के लिए उन अपराधियों को निकालना आवश्यक है, फिर चाहे इसके लिए उस स्थान को ही क्षति पहुंचानी पड़े |
३१ अक्टूबर १९८४ को भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंद्रा गांधी की नृशंश हत्या के पश्चात, जिस प्रकार ३ नवम्बर १९८४ तक सम्पूर्ण राष्ट्र में खुले आम सरकार समर्थित गुंडों द्वारा सिक्ख समुदाय का कत्ले आम किया गया, उन्हें जिन्दा जलाया गया, उनकी महिलाओं के साथ पहले अनाचार फिर हत्या कर जला दिया गया, उनके घरों-दुकानों को लूटा गया, जलाया गया, सरकारी आंकड़ों के अनुसार २८०० से अधिक लोगों की हत्या कर दी गई थी, जिसमें से २१०० से अधिक लोग केवल दिल्ली में मारे गए थे | सरकारी सुरक्क्षा बल अपने सामने यह सब न केवल होने दे रहे थे, अपितु स्वयं लूट में सम्मिलित थे, तथा सरकार समर्थित उन गुंडों और हत्यारों का सहयोग भी कर रहे थे; इन गुंडों और हत्यारों में कई उस समय जन प्रतिनिधि भी थे | आज इस घटना को हुए ३० वर्ष से अधिक हो गए; परन्तु किसी भी ऐसे जनप्रतिनिधि को, जो इस हत्या काण्ड में सम्मिलित था, अभी तक कोई दंड नहीं दिया गया है, दण्डित करना तो बहुत दूर की बात है ‘ जब कोई बड़ा पेड गिरता है, तो धरती कांपती है’ कह कर इस नरसंघार को समर्थन देने वाले को भारत रत्न से सम्मानित कर दिया जाता है; तब भी इन लोकतंत्र के मंदिरों में बैठने वाले सभी प्रतिनिधियों का एक ही उत्तर होता है, कोई बख्शा नहीं जाएगा और क़ानून अपना कार्य करेगा |
इसी प्रकार २-३ दिसंबर १९८४ की रात्रि को भोपाल स्थित युनियन कार्बाइड के कारखाने में दुर्घटना घटी और उस त्रासदी में पहले चार-पांच दिनों में ८००० से अदिक लोग काल के गाल में समा गए, एक माह से कुछ अधिक व्यतीत होते होते ८००० से अधिक और कालकलवित हो गए, बीसों हजार लोग विभिन्न प्रकार की गंभीर बीमारियों से ग्रसित होकर भयंकर पीड़ा झेलते हुए, मृत्यु की प्रतीक्षा करने को विवश थे | ऐसे में उस कारखाने के मालिक वारेन एंडरसन को पकड़ कर इन लोगों को समुचित मुआवजा दिलवाना, जो अनाथ हो गए थे उनके भविष्य के जीवनयापन की समुचित व्यवस्था करवाना, जो गंभीर रोगों से पीड़ित हुए थे, उनके निःशुल्क समुचित उपचार की व्यवस्था करवाना, उस समय की सरकार का उत्तरदायित्व था; परन्तु वैसा कुछ भी नहीं हुआ; अपितु उसे पूर्ण सुरक्षित मार्ग दे कर यहाँ से पलायन करवा दिया गया | इसके पश्चात कई बार सरकारें बदलीं लेकिन, मानवता के दुश्मन इन अपराधियों पर किसी प्रकार की कोई कार्यवाही ३० वर्ष से अधिक का समय बीत जाने पर भी आज तक नहीं हुई | इस प्रकार हम देखें तो तमाम अपराधों में इन तथाकथित लोकतंत्र के मंदिरों में बैठने वाले सभी जनप्रतिनिधि बराबर के अपराधी हैं; अतएव यह सुनिश्चित होता है कि ये लोकतंत्र के मंदिर नहीं अपितु गंभीर अपराधियों के अड्डे बन गए हैं |
अभी अभी कुछ दिनों पूर्व पता चला कि जनता की गाढी कमाई का केवल सरकारी बैंकों का साढ़े तीन लाख करोड़ से अधिक धन एन.पी.ए. है; जिसके वापस आने की संभावना नहीं के बराबर है | इसके अतिरिक्त बी.जे.पी. समर्थित एक राज्यसभा सांसद विजय माल्या सरकारी बैंकों का ९००० करोड़ से अधिक धन लेकर २ मार्च २०१६ को सुरक्क्षित भारत से सफलता पूर्वक भाग गया या भगा दिया गया और अब उसे वापस पकड कर लाने का दिखावा कर उसी प्रकार जनता को मूर्ख बनाया जा रहा है, जैसा कि ललित मोदी के मामले में बनाया गया था | यह तो सरकारी बैंकों के आंकड़े हैं; यहाँ कम से कम आम जनता का धन डूबा तो नहीं है, सरकार उसे वापस करेगी ऐसी अपेक्षा है | परन्तु उन निजी बैंकों, चिटफंडो और सहकारी बैंकों का क्या ? जिनसे हजारों करोड़ का उधार इन माननीयो एवं अन्य प्रभावशाली लोगों ने लिया; परन्तु वापस करने से इनकार कर दिया | उसके पश्चात उनका पंजीकरण भारतीय रिजर्व बैंक ने निरस्त कर दिया | इस प्रकार के उधार में रिजर्व बैंक के अधिकारी, उस बैंक के अधिकारी तथा प्रभावशाली उधार लेने वाले ये आर्थिक अपराधी मिले हुए होते हैं और सामान्य जनता का पैसा हजम कर जाते हैं | पहले रिजर्व बैंक के भृष्ट अधिकारी इन बैंकों, चिटफंडो को लाइसेंस देने में मोटी रकम खाते हैं; आम जनता समझती है कि ये बैंकें, रिजर्व बैंक एवं भारत सरकार की निगरानी में कार्य कर रहीं हैं अतएव उनका धन उतना ही सुरक्क्षित है, जितना सरकारी बैंकों में; परन्तु घोटाला होने के पश्चात पता चलता है कि इन सभी संस्थाओं की जिम्मेदारी केवल कमीशन खाने तक थी; और जनता की जीवन भर की गाढी कमाई एक झटके में डूब जाती है | अपना स्वयं का धन होने पर भी, जमाकर्ता एक एक पैसे को मोहताज होकर, खून के घूँट पीकर रहने को विवश होता है; और ऋण लेने वाले ये माननीय इन तथाकथित मंदिरों में सुरक्षित बैठ कर राष्ट्र भक्ति, ईमानदारी आदि की बड़ी बड़ी बातें करते हैं | यदि किसी फलदार वृक्ष में कीड़े लग जाएं और सभी फलों को चट कर जाएं, तो एक एक कीड़े को नहीं मारा जाता है, अपितु पूरे वृक्ष पर ही कीटनाशक का छिडकाव करना पड़ता है | आज ऐसी ही स्थिति इस लोकतंत्र के वृक्ष की हो गई है, जिसमें जनता को मिलने वाले फल को, ये जनप्रतिनिधि, बड़े भृष्ट व्यापारी और बड़े माफिया मिलकर खा जा रहे हैं |
१३ अप्रैल १९१९ को अमृतसर के जलियाँ वाला बाग़ में शांतिपूर्ण ढंग से सभा कर रहे; निहत्थे लोगों पर जनरल डायर ने गोलियां चलवा दी थीं | जिसमें १५२६ से अधिक लोगों की मृत्यु हुई थी और ११०० से अधिक घायल हुए थे; उन मरने वालों में अमर शहीद ऊधम सिंह के पिता भी थे; लगभग २१ वर्ष पश्चात इंग्लैंड के कैक्सटन हाल में १३ मार्च १९४० को अपने पिता की मृत्यु का बदला लेते हुए, ऊधम सिंहजी ने १५२६ लोगों के हत्यारे जनरल डायर को गोलियों से भून दिया था | आज ३० वर्ष से अधिक व्यतीत होने पर भी सिक्खों के हत्यारे उन माननीयों का बाल भी बांका नहीं हुआ, इसी प्रकार भोपाल त्रासदी के अपराधियों को किसी प्रकार का दंड दिलवाने का अभी तक कोई प्रयाष ही नहीं किया गया है | लाखों लोगों की खून-पसीने की कमाई ये अपराधी हजम कर गए; ऐसे में जिनको किसी प्रकार की त्रासदी से नहीं गुजरना पड़ा है, और इस व्यवस्था की लूट का अंग बने हुए हैं; वे निश्चित राष्ट्र भक्ति की बड़ी बड़ी बातें कर सकते हैं; परन्तु जिनका सब कुछ इन अपराधियों ने लूट लिया है, और तीस वर्ष पश्चात भी कहीं से न्याय की आश नहीं है उन्हें तो निरंतर प्रतीक्षा रहेगी एक ऊधम सिंह की, जो इन हत्यारों से अगणित हत्याओं का बदला ले सके, एक भगत सिंह की जो इन बहरे कानों को सुनाने के लिए इन अपराधी अड्डों पर धमाके कर सके |

इस लोक सभा चुनावों के पश्चात स्वतंत्र भारत में प्रथम बार एक सांसद (श्री नरेन्द्र मोदी ) ने लोकतंत्र के मंदिर के बाहर सीढ़ियों पर बैठ कर पहले प्रणाम किया, फिर मंदिर में प्रवेश किया और आज वे ही इस सरकार के मुखिया भी हैं; उनसे लोक को बहुत आशा एवं अपेक्षाएं हैं, कि वे पुनः इस मंदिर की पवित्रता को स्थापित कर सकेंगे, और बगैर भेद-भाव के सभी अपराधियों को उचित दंड दिलवाने की व्यवस्था करेंगे | अन्यथा .......

मंगलवार, 1 मार्च 2016

अनैतिक

अनैतिक
९ फरवरी २०१६ को जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में जो कुछ हुआ, निश्चित वह घोर अनैतिक था | प्रषाशन के अनुसार उस दिन वहां की क्षात्र युनियन ने संसद पर हमले के दोषी अफ्जलगुरू की फांसी की वर्षगाँठ पर विरोध मनाते हुए यूनिवर्सिटी प्रांगण में घोर आपत्ति जनक राष्ट्रविरोधी नारे लगाए, जिसके अपराध में कन्हैया, खालिद आदि को राष्ट्रद्रोह के आरोप में बंदी बना लिया गया | इसके पूर्व इसी प्रकार की घटना हैदराबाद यूनिवर्सिटी में हुई थी, जिसमें पी.एच.डी. के क्षात्र रोहित और उसके साथियों को राष्ट्रविरोधी नारे लगाने के आरोप में दण्डित किया गया था, बाद में रोहित ने आत्महत्या कर ली थी | इन सभी घटनाओं ने मन को उद्वेलित कर दिया था, कि क्या वास्तव में ये उच्च शिक्षा के मंदिर राष्ट्रद्रोह के अड्डे बन गए हैं ? या बीमारी कुछ और हे, और ये लक्षण मात्र हैं |
कोई भी कृत्य, चाहे वह नैतिक हो या अनैतिक, कुकृत्य हो या सत्कृत्य, अनाचार हो या सदाचार, दुष्कर्म हो या सत्कर्म, पाप हो या पुण्य, राष्ट्रद्रोह हो राष्ट्रवंदन तीन प्रकार से ही किया जाता है और किया जा सकता है    १. मन से            २. वचन से         ३. कर्म से
कोई भी कृत्य पहले मन से, फिर वचन से अर्थात वाणी से और फिर कर्म से अर्थात कार्य रूप में परिणित किया जाता है | लेकिन यह नि:तांत आवश्यक नहीं कि जो मन से किया जाय, वही वचन से भी किया जाए और कर्म से भी किया जाए, अर्थात कोई व्यक्ति मन से कुछ, वचन से कुछ, तथा कर्म कुछ और कर सकता है | किसी के मन में क्या चल रहा है, यह समझ पाना शायद अति दुष्कर है; परन्तु वाणी और कृत्य ही प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं | यदि कोई व्यक्ति वचन से सत्कर्म की बड़ी बड़ी बातें करे, और कर्म घोर अनैतिक एवं निंदनीय हों (जैसा कि कई उपदेशकों, राजनेताओं, का देखने में आया है), तो उसे सत्कर्मी कहेंगे या दुष्कर्मी ? कुछ लोग ऐसे भी मिलते है, जिनके मुख से सदैव अभद्र भाषा ही निकलती है, लेकिन निश्छल ह्रदय एवं अति सदाचारी होते हैं | यदि राष्ट्रद्रोह के नारे लगाने वाले ये क्षात्र राष्ट्रद्रोही हैं, तो सत्ता में बैठे वे राजनेता, जो राष्ट्रप्रेम पर लम्बे लम्बे व्यक्तव्य देते हैं, प्रातः – सायं राष्ट्र वंदना भी करते हैं, लेकिन राष्ट्र के खजाने का अरबों रुपया गबन कर जाते हैं, क्या हैं ? राष्ट्रद्रोही नहीं हैं? वे ठेकेदार – इंजीनियर, जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए निम्न श्रेणी का निर्माण कार्य करते हैं, जिसके कारण बड़ी दुर्घटना घटती है और राष्ट्र की व्यापक क्षति होती है, वे क्या हैं? वे चिकित्सक जो सरकारी वेतन लेते हुए भी, रोगी को फीस की लालच में सरकारी चिकित्सालय में नहीं देखते, वे क्या हैं? जो भी कर्मचारी पूरा वेतन लेने के उपरान्त भी जन कार्य बगैर घूस के नहीं करता, वह क्या है? व्यापारी विभिन्न उपभोगता वस्तुओं में मिलावट कर, उपभोक्ताओं के जीवन से खिलवाड़ करता है, क्या यह राष्ट्रद्रोह नहीं है ? क्या केवल मुख से नारे लगाना ही राष्ट्रद्रोह है ? यदि नारे लगाने वालों के विरुद्ध राष्ट्रद्रोह का अभियोग लगाया जा सकता है, तो इन सभी लोगों के विरुद्ध क्यों नहीं? इतने राष्ट्रद्रोही जिस राष्ट्र में निर्द्वंद घूम रहे हों, वहां प्रतिक्रिया स्वरूप इस प्रकार के नारे लगना अस्वाभाविक नहीं है |
यह लोक तंत्र है अर्थात जनता की सरकार जनता के द्वारा जनता के लिए, ऐसा कहा जाता है, लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? जिस राष्ट्र में सामान्य नागरिक सदैव असुरक्षित हो; वहां नेता सरकारी सुरक्षा गार्डों की छाया में विभिन्न श्रेणी की सुरक्षा लिए रहते हों? जहां जन सामान्य बगैर चिकित्सा के तडप तडप कर जीवन समाप्त करने को विवश हो वहां जन प्रतिनिधियों को देश में ही नहीं विदेश में भी श्रेष्ठतम चिकित्सा उपलब्ध हो ? जहाँ की ४०% से अधिक जनसँख्या दोनों समय भर पेट निकृष्ट भोजन भी न पाते हों, वहीं उनके प्रतिनिधि मात्र ३० रु में सुस्वादु पौष्टिक भोजन करते हों ? जन सामान्य के लिए सस्ती शिक्षा की व्यवस्था बिगाड़ कर इन नेताओं, व्यापारियों एवं अपराधियों ने महंगी शिक्षा का ऐसा मकड़जाल रचा कि जन सामान्य लुटने के लिए विवश है | सामान्य जनता का परिश्रम से कमाया धन बैंकों में जमा किया जाता है और सरकार की सहमति से उस धन से अरबों रु. बड़े भृष्ट व्यापारी और नेता उधार लेकर वापस नहीं करते, ऐसे में अपना धन होने पर भी सामान्य व्यक्ति धनाभाव में जीवन व्यतीत करने को विवश होता है; जीवन के हर क्षेत्र में मची लूट के कारण, जहां जन सामान्य निरीह एवं विवश है, वहां इस लोकतंत्र के विरुद्ध आक्रोश उत्त्पन्न होना स्वाभाविक है, अतएव यह समझना कठिन है कि अफ्जलगुरू ने संसद पर हमला किया था, या इन ऐयाश भ्रष्ट एवं राष्ट्रद्रोही सांसदों पर ? 
कई बार कोई कुकृत्य जो हमें जैसा दिखाई पड़ता है, वैसा होता नहीं है, इस विषय में एक छोटी सी घटना उल्लिखित कर रहा हूँ, यह न तो काल्पनिक है, न कहानी है, यह वास्तविक है | मेरे एक सहयोगी थे केंद्र सरकार के कार्यालय में अधिकारी थे, उन्होंने बताया था कि उनके अधीनस्थ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी इतने चोर प्रतीत हुए कि कोई भी छोटा से छोटा सरकारी सामान, (उपकरणों में लगने वाला बिजली का तार, ताला, पेचकस आदि) पलक झपकते गायब हो जाता ; एक - दो माह में ही वे परेशान हो गए, नया सामन खरीदा और गायब, अब तत्काल दूसरा सामन कैसे खरीदें ; परन्तु इसमें एक विशेष बात यह थी, कि व्यक्तिगत सामन चोरी नहीं होता था | उन्होंने एक प्रयोग किया, काफी समय वे अपना कार्यालय छोड़ कर, अधीनस्थ कर्मचारियों के मध्य बैठने लगे, और बाजार से कार्यालय का सभी सामान स्वयं न लाकर उन्ही से मंगवाने लगे ( दूकाने निश्चित थीं, जहां कोई हेराफेरी नहीं होती थी ), और तो और अपनी अलमारी से रूपये भी स्वयं न निकाल कर उन्ही से निकलवाते और बचा धन तथा रसीदें भी उन्ही से रखवाते और लगभग आठ वर्षों में एक भी रु की गड़बड़ी नहीं हुई | कुछ ही दिनों में सब कुछ बदल गया, अब कोई सामान गायब नहीं होता था, इसका तात्पर्य वे चोर नहीं थे; वह केवल प्रतिक्रिया थी; जैसे ही उन्हें विश्वाष हुआ कि उनका अधिकारी भृष्ट नहीं है, तो उन्होंने भी पूर्ण सहयोग दिया था | बहुत पुरानी बात नहीं है, भारत के प्रधानमंत्री लालबहादुर शाश्त्री ने सपरिवार स्वयं सप्ताह में एक दिन का उपवास रखते हुए, राष्ट्र से एक दिन का उपवास करने का आग्रह किया था, और आश्चर्य जनक रूप से घरों की बात तो छोडिये होटल भी स्वेक्षा से बंद होते थे |

केवल नैतिक होना ही पर्याप्त नहीं है नैतिक दिखना भी चाहिए | जब तक जनतंत्र में जन उपेक्षित रहेगा और भृष्ट, दुराचारी, अनाचारी नेता जनप्रतिनिधि रहेंगे | भृष्ट कर्मचारी, अपराधी, मिलावटखोर व्यापारी और नेताओं का गठबंधन रहेगा, तब तक इस प्रकार के नारे भी जीवित रहेंगे और राष्ट्रद्रोहितापूर्ण दिखने वाले कृत्य भी; परन्तु वे कृत्य राष्ट्रद्रोह पूर्ण हो आवश्यक नहीं, वे इस भृष्ट व्यवस्था के विरुद्ध हो सकते हैं; वास्तव में राष्ट्रद्रोही ये विरोध प्रदर्शन करने वाले नहीं; अपितु ये राजनेता, माफिया, और मिलावटखोर भ्रष्ट व्यापारी एवं कर्मचारी हैं और दंड के वास्तविक पात्र भी यही लोग हैं |

सोमवार, 31 अगस्त 2015

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक मिथक


      भारत ईश्वरीय अनुकम्पा से परिपूर्ण एक ऐसा महान राष्ट्र है, जहाँ संकट के समय वह स्वयं अवतरित होता है | जब जब इस राष्ट्र पर चतुर्दिक आपदा आई तब कभी राम तो कभी कृष्ण अवतरित हुए, जब यहाँ हिंसा और अस्पृश्यता का नग्न तांडव हो रहा था तो एक ही समय भगवान् गौतम बुद्ध और भगवान् महावीर का प्रादुर्भाव हुआ जिसने न केवल भारत, अपितु सम्पूर्ण मानवता के घावों पर ओषधि लगाने का कार्य किया एवं एक कालजयी मार्ग प्रसस्त किया; इसी प्रकार जब मुग़ल आक्रान्ता अकबर द्वारा समस्त हिन्दू समाज का क्षद्म सहिष्णुता की आड में धर्मान्तरण किया जा रहा था और उनकी तीर्थ यात्राओं पर जबरन कर वसूला जाता था, तब इस समाज का मार्ग दर्शन करने एक साथ कबीर, सूर, तुलसी, मीरा जैसी नित्य वन्दनीय विभूतियों का अवतरण हुआ और मुग़ल दासता से मुक्त कराने हेतु वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का निरंतर संघर्ष भयभीत हिन्दू समाज के लिए एक संबल बना रहा था| जब औरंगजेब का क्रूर शाषन इस राष्ट्र पर अत्याचार कर रहा था, और बलात धर्मांतरण कराया जा रहा था, तब उसका प्रतिकार करने एक ही समय गुरू तेगबहादुर, वीर शिवाजी महाराज, वीर वर दुर्गादास, गुरू गोविन्द सिंहजी महाराज जैसी महान विभूतियों का प्रागट्य हुआ | जब यह राष्ट्र आपसी वैमनस्यता और फूट के कारण कुटिल अंग्रेजों की दासता की बेड़ियों में जकड़ा, उन्हें तोड़ने को कसमसा रहा था तब सुभाष, चन्द्रशेखर , भगत सिंह, वीर सावरकर, महात्मा गांधी जैसे सहस्त्रावधि स्वतंत्रता सैनानियों का जन्म हुआ तो यहाँ व्याप्त बुराइयों का प्रतिकार करने महान चिन्तक डा. हेडगेवार और डा. आंबेडकर जैसे युगदृष्टाओं का जन्म हुआ, जिन्होंने समग्र हिन्दू समाज के एकीकरण में अतुलनीय योगदान किया है |
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्म डा. हेडगेवार द्वारा १९२५ में अत्यंत सादगी पूर्ण तरीके से, बगैर किसी आडम्बर के निःष्कपट तरीके से एक छोटे परन्तु अत्यंत मत्वपूर्ण उद्द्येश्य की पूर्ती के लिए हुआ था | उद्येश्य था समग्र हिन्दू समाज (हिन्दू कोई धर्म या मत नहीं, अपितु एक जीवन पद्धति है जिसमें एक ओर अहिंसा परमो धर्मा है तो दूसरी ओर शठे प्रति शाठ्ये है, यही पद्धति कहती है “सर्वे भवन्तु सुखिनः”) को बगैर किसी प्रकार के भेद भाव के (विभिद उपासना पद्धतियों, जातियों, उप जातियों, वर्ण, राजनैतिक भिन्नता, मत-मतान्तरो, आर्थिक, सामजिक विभेदों का ध्यान किये बगैर) संगठित करना और अपने पूर्व गौरव तथा सदाचरण को स्मरण करते हुए, इस राष्ट्र को परम वैभव प्रदान करना, जितना सहज और सरल इसका जन्म था, उतनी ही सहज और सरल इसकी कार्य पद्धति भी है | २४ घंटे में निश्चित समय पर मात्र एक घंटे की प्रतिदिन शाखा, जिसमें विभिन्न शारीरिक व्यायाम, पूर्ण अनुशाषन में रहते हुए सदाचारिता के साथ करना और “तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें” जैसे गीतों द्वारा माँ भारती की वंदना करना और अंत में माँ भारती की प्रार्थना करना | संघ का मानना है यदि व्यक्ति निर्माण हुआ तो उससे समाज और समाज से राष्ट्र निर्माण स्वतः होगा | परन्तु विडंबना है कि अधिकाँश लोग, जो इतने सहज नहीं होते, संघ के इस सरल कार्य को भी शंसय की दृष्टि से देखते हैं; इसमें उनका कोई दोष नहीं हैं निरंतर चतुर्दिक सामाजिक कुरीतियों और कुटिलताओं से घिरे किसी भी व्यक्ति को सहज ही किसी की सहजता पर तत्काल विश्वास नहीं होगा | संघ को समझने के लिए निरंतर समर्पण भाव से उसके सानिद्ध्य में आना होगा | संघ के विषय में अनेकानेक भ्रान्तियां है कि संघ यह करता है, संघ वह करता है| यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि संघ केवल और केवल निःस्वार्थी, सदाचारी, राष्ट्रभक्त व्यक्तियों का निर्माण करता है, यह एक विद्यालय मात्र है| यहाँ से निकले व्यक्ति अपने अपने तरीके से राष्ट्र और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी अपनी सामर्थ्य और योग्यता के अनुसार कार्य करते हैं| ऐसा नहीं है कि संघ के लोगों में विकार नहीं हैं, या दोष नहीं हैं| संघ की शाखा में मात्र एक घंटे आने वाला व्यक्ति शेष २३ घंटे उसी कलुषित वातावरण में रहता है, जिसमें सामान्य व्यक्ति की बात तो क्या, वल्कल वस्त्रधारी सन्यासी भी विकारों में लिप्त पाए जाते हैं; तो निःश्चित उस वातावरण का प्रभाव भी उस पर रहेगा, फिर शाखा में कितना समर्पण रहता है, कितने दिन आता है, इन सबका प्रभाव भी रहता है| किसी अच्छे से अच्छे विद्यालय में भी क्या सभी क्षात्र अच्छे निकलते हैं? एक ही अध्यापक द्वारा पढाए क्षात्रों में योग्यता और आचरण भिन्न भिन्न पाया जाता है, परन्तु केवल अच्छे क्षात्र के प्रदर्शन का श्रेय उस संस्थान और उस आचार्य को जाता है| आप अब से पचास वर्ष पूर्व के हिन्दू समाज का स्मरण करें, जब वह इतना हतोत्साहित और खिन्न था कि स्वयं को हिन्दू कहलाने में अपमानित अनुभव करता था, आज वही समाज अपने को गौरवान्वित अनुभव करता है, आज अनेकानेक सन्यासी जो अस्पृश्यता के विरुद्ध खड़े दिखाई देते हैं और आदिवाषी, वनवासी, एवं इस प्रकार के अभावग्रस्त लोगों के मध्य कार्य करते दीखते हैं, वह कहीं न कहीं संघ जैसी संस्थाओं का अपरोक्ष अथवा परोक्ष प्रभाव ही है|
इस समय इस राष्ट्र में प्रतिदिन ५१००० से अधिक दैनिक शाखाएं लग रही हैं, जिनमें व्यक्ति निर्माण का निरंतर प्रयास किया जाता है, संघ शाखाओं पर आने वाले स्वयंसेवक किसी प्रकार के भय या लालच के वशीभूत हो कर नहीं आते , अपने सीमित साधनों से अपना और परिवार का भरण-पोषण करते हुए, अपना धन एवं समय दे कर संघ का कार्य करते हैं | जहां सामान्य व्यक्ति कोई भी कार्य किसी न किसी लाभ की अपेक्षा से करता है, यहाँ तक कि वैरागी सन्यासी भी अपनी ख्याति और चरण वंदना का लोभ अपने मन में रखते हैं ; वहीं संघ का स्वयमसेवक सभी प्रकार की इक्षाओं को त्याग राष्ट्रोत्थान के लिए समर्पित रहता है | ऐसे देवदुर्लभ कार्यकर्ता एक दिन में नहीं बनते , सतत प्रयास किया जाता है , अपनी ९० वर्ष की इस सतत यात्रा में कई झंझावातों को सहते हुए संघ ने अनगिनत ऐसे हीरे तराश कर इस राष्ट्र की सेवा में समर्पित किये हैं , जिनके निःस्वार्थ समर्पण और त्याग के समक्ष किसी का मस्तक भी स्वतः झुक जाएगा | प्रातः वन्दनीय, एकनाथजी रानाडे जिन्होंने विवेकानंद स्मारक की स्थापना की, सदा शिव गोविन्द कात्रे, जिन्होंने भारतीय कुष्ठ निवारक संघ की स्थापना की, पंडित दीन दयालजी उपद्ध्याय, जिन्होंने अन्त्योदय का विचार राष्ट्र को दिया, नानाजी देशमुख, जिन्होंने चित्रकूट में ऐसा कार्य खडा किया कि आस-पास के ग्रामीण बन्धु स्वावलंबी हो सके, भारतीय मजदूर संघ के प्रणेता दत्तो पंतजी ठेंगणी आदि अनेक ऐसे नगीने ,जिनके कार्य से हम उन्हें जानते हैं ; परन्तु वे मूर्धन्य कार्यकर्ता जिन्होंने इनको तराश कर इस योग्य बनाया ऐसे सैकड़ों समर्पित कार्यकर्ताओं के नाम कौन जानता है | यही संघ की परिपाटी है और यही कार्य पद्धति |

जनमानस को संघ से असीमित अपेक्षाएं हैं , संघ का सामर्थ्य सीमित है, क्योंकि जिस समाज से संघ को स्वयंसेवकों की पूर्ती होती है, वहां निरन्तर मानवीय एवं नैतिक मूल्यों का पतन होता जा रहा है ऐसे में संघ भी उस प्रदूषण से बच नहीं सका है, विशेष रूप से जबसे इसे राजनैतिक संबल प्राप्त हुआ है, इसके मूल्यों में गिरावट आई हुई दिखती है और ऐसे में जब मानस की अपेक्षाएं उनकी इक्षानुरूप पूर्ण नहीं होती तो संघ के कार्यकर्ता की छोटी से छोटी भूल पर उन्हें क्षोभ होता है और अपना स्नेह गुस्से के रूप में संघ पर उतारते हैं , यही क्रोध संघ को संबल प्रदान करता है , और उसे भरोसा दिलाता है, कि समस्त हिन्दू समाज उसकी ओर आशा भरी दृष्टि से निहार रहा है |

सोमवार, 19 मई 2014

जन को जोड़ता तंत्र

१५ अगस्त १९४७ को अंग्रेजों की दासता से मुक्ति के बाद भारत के राष्ट्र नायकों ने जनतंत्र का मार्ग चुना, जिसका तात्पर्य था जनता की सरकार, जनता द्वारा, जनता के लिए. विचार अच्छा था भारत का जनमानस यह सोच कर अभिभूत था कि अब भारत में उसकी अपनी सरकार होगी, चोर उचक्कों से उसकी रक्षा होगी, अब उसे लूटा नहीं जाएगा, उसे भर पेट भोजन, तन ढकने को वस्त्र और सिर छुपाने के लिए एक छत होगी. उसकी बहन बेटियों की इज्जत, जो अंग्रेजों के राज्य में सुरक्षित नहीं थी अब सुरक्षित होगी. बस यही छोटी छोटी सी इक्षाएं थीं और इन्ही इक्षाओं को पूरा करने के लिए उसने बलिदान दिए थे. लेकिन स्वतंत्रता के तत्काल बाद पता लगा वे सब सपने थे, देश गोरे साहबों के हाथ से निकल कर काले साहबों का गुलाम हो गया था, भारत के जन का बलिदान व्यर्थ चला गया था, वह ठगा गया था. इस स्वतंत्र भारत में जन और तंत्र अलग अलग रहा, आजादी के प्रारम्भ के दिनों में सत्ता की डोर जिस दल के हाथ में थी उसका नाम भी कांग्रेस था, वही कांग्रेस जिसने भारत की स्वतंत्रता और उसके विघटन में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी, स्वतंत्रता के पश्चात गांधीजी ने कहा था अब कांग्रेस को समाप्त कर देना चाहिए, और भारत पर शाषन करने के लिए नए दल का गठन किया जाना चाहिए, लेकिन गांधी के अनुयायिओं को यह परामर्श उचित नहीं लगा, क्योंकि कांग्रेस से सामान्य जन के भावनात्मक लगाव का दोहन कर, तत्कालीन प्रधानमन्त्री निरापद शाषन करना चाहते थे, और उन्होंने किया भी. उसी समय से भारत के शाषक जन से दूर होते चले गए और लोगों का जनतंत्र में कोई उत्साह नहीं रहा इसी लिए उस समय मतदान प्रतिशत ५०% से काफी कम रहता था और मात्र २०% मत पाने वाला दल सरकार बना लेता था जो भारत के ८०% को स्वीकार्य नहीं होती थी, जनता की नजरों में नेताओं का सम्मान गिरता चला गया, उनके लिए कोई भी भद्दी से भद्दी गाली भी छोटी लगने लगी, नेता जनता से दूर होते चले गए, क्योंकि वे जनता के प्रतिनिधि थे ही नहीं, वे तो अंग्रेजों की जगह नए ठग और लुटेरे थे, जनता की समस्याएं दासता के दिनों से भी अधिक दुष्वार हो गईं थी, और नेता लूट खसोट में मस्त थे. जन की इन नेताओं के प्रति नफरत बढ़ती चली जा रही थी, इसका प्रमाण है, जब १९७७ में श्रीमती गांधी ने आपातकाल लगा कर सभी नेताओं को जेलों में ठूंस दिया था, तो आक्रोशित होने के स्थान पर जनता संतुष्ट थी; यदि लोगों की जबरदस्ती नसबंदी नहीं की गई होती तो इन जेल में बंद नेताओं के जीवन की परवाह किये बगैर जनता दोबारा श्रीमती गांधी को ही चुनती; क्योंकि अब ५४३ लुटेरों के स्थान पर एक ही लुटेरा बचा था, यह एक कडवा सच है. इसी प्रकार जब संसद भवन पर आतंकी हमला हुआ था तो भारत का जन जन आक्रोशित था, भारत की अस्मिता पर हुए इस आक्रमण पर, लेकिन शायद बहुत कम लोग रहे होंगे जो नेताओं की सुरक्षा को लेकर चिंतित हुए होंगे.
 भारत में प्रारम्भ से ही निरंतर सत्ता में बने रहने के मोह में हमारे राष्ट्रनायकों ने जनता की भलाई का कार्य न करते हुए, जनता को भिन्न भिन्न समूहों में बाँट कर उनमें वैमनस्यता फैला कर अपना वोट बैंक बनाने का कार्य किया, कभी अनुसूचित जाति के नाम पर, तो कभी अगड़ों के नाम पर, कभी पिछड़े, तो कभी अति पिछड़े, कभी अल्पसंख्यक, तो कभी बहु संख्यक के नाम पर, कभी मंडल, तो कभी कमंडल, और उसका परिणाम हुआ चुनावों में खंडित जनादेश, जिसके परिणाम स्वरूप छोटे छोटे राजनैतिक दल मिलकर सत्ता चलाते और मनमानी लूट को अंजाम देते, जिससे महगाई और भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा था, घोटाले कुछ लाख रूपये से बढ़ कर लाख करोड़ तक पहुँच गए, और सामान्य जन गरीबी लाचारी में निरीह भाव से पिस रहा था. आधी से अधिक आबादी को दो वक़्त का भरपेट भोजन उपलब्ध नहीं, अपनी लज्जा को ढकने के लिए वस्त्र नहीं, रोगी को उपचार नहीं, बच्चों को शिक्षा के लिए विद्यालय नहीं, बहन बेटियों की अस्मत सड़कों पर, सार्वजनिक स्थलों, कार्यालयों, तथा घर में भी सुरक्षित नहीं, न्याय के मंदिर और शिकायतें सुनने के स्थान भ्रष्टाचार के अड्डे बन गए. जनता दासता के दिनों से भी बुरे दिनों को काटने को विवश और नेता अरबों रुपये की चोरी करके विभिन्न प्रकार के निकृष्ट अपराध करते हुए विशेष सुरक्षा दस्ते के साथ अय्याशी में लिप्त थे. ये दुष्ट इस राष्ट्र पुरुष के समग्र जन को निज स्वार्थ में टुकड़ों टुकड़ों में बाँट कर सत्ता का आनंद खंडित जनादेश से उठा रहे थे. भारत की जनता अत्यधिक संवेदनशील और संतोषी है, जब भी तंत्र ने जन को विश्वास में लिया है भारत के जन ने उसे खुले दिल से समर्थन दिया है. लाल बहादुर शास्त्री ने जनाकांक्षाओं को कुछ हद तक समझा था और संकट काल में एक दिन मंगलवार को एक समय भोजन स्वयं न करते हुए समग्र राष्ट्र से न करने का आग्रह किया था, घरों की बात तो छोडिये, होटल भी एक समय बंद रहते थे, ऐसा अभूतपूर्व समर्पण है भारत के जन का, इसमें अगड़े,पिछड़े,सूचित,अनुसूचित,अल्पसंख्यक,बहुसंख्यक का भेद नहीं था. सम्पूर्ण राष्ट्रपुरुष अपने राष्ट्रनायक के एक आवाहन पर त्याग और बलिदान के लिए तत्पर था.

श्रीमती गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया, उन्हें स्पष्ट और प्रचंड बहुमत मिला, कारण गरीबी सब की एक जैसी होती है. जब भूख लगती है तो वह सवर्ण और हरिजन में, अगड़े – पिछड़े में, हिन्दू और मुसलमान में भेद नहीं करती है, भूख सब को एक जैसी लगती है, जब बच्चों को भरपेट भोजन नहीं दे पाती तो हर माँ के ह्रदय में एक जैसी वेदना और लाचारी होती है. जब चिकित्सा के अभाव में किसी का बच्चा या आत्मीयजन मर जाता है तो पीड़ा सभी को एक जैसी होती है. जाड़े की ठिठुरन भरी रातों में जब तन पर पर्याप्त वस्त्र नहीं होते तो ठंड की पीड़ा सभी को एक जैसी होती है. युवा होती पुत्री को लज्जा ढकने योग्य वस्त्र भी जब माता-पिता नहीं उपलब्ध करा पाते तो हिन्दू और मुसलमान की पीड़ा में कोई अंतर नहीं होता, जब सड़कों, सार्वजनिक स्थलों और पुलिस थानों पर युवती की अस्मत लुटती है तो जो पीड़ा और गुस्सा फूटता है, वह सभी में सामान होता है और इन अय्याश नेताओं के प्रति नफरत भी वैसी ही होती है. श्रीमती गांधी ने इस पीड़ा को समझा था और जन की समस्या गरीबी दूर करने की बात कर जन को स्वयं से जोड़ने का प्रयास किया, जिसका परिणाम स्पष्ट बहुमत था, इन्द्राजी के पश्चात सभी दल जन से दूर होते चले गए. कोई अल्पसंख्यकों को भयभीत कर रहा था, तो कोई उन्हें चार निकाह की अनुमति दे रहा था, कोई तिलक तराजू और तलवार ... कह कर समाज में नफरत और दरार पैदा कर रहा था, कोई राम मंदिर और धारा ३७० का राग अलाप रहा था, ऐसे में जन से दूर इस तंत्र का जो हस्र होना चाहिए था वही हुआ, निरंतर खंडित जनादेश मिला और अल्पमत सरकारों को चलाए रखने के लिए आँख बंद कर खुली लूट होने दी गई. २०१४ के चुनाव में मोदीजी ने इस समस्या को समझा और जनता के मध्य जन जन से जुड़े मुद्दे ‘भय, भूख, भर्ष्टाचार’ के विरुद्ध युद्ध छेड़ने की घोषणा कर दी और जन, तंत्र के साथ स्वःस्फूर्त जुड़ता चला गया, जिसका परिणाम ये चुनाव परिणाम हैं. अब देखना ये है कि जन कहीं फिर ठगा अनुभव न करे.

बुधवार, 29 जनवरी 2014

येडा मुख्यमंत्री

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को भारत सरकार के गृह मंत्री शुशील कुमार शिंदे ने एक कार्यक्रम में येडा मुख्यमंत्री कहा, संभवतः इन शब्दों का प्रयोग केजरीवाल द्वारा धरने के समय गृह मंत्री के लिए कठोर शब्दों के प्रयोग (मैं दिल्ली का मुख्य मंत्री हूँ मैं शिंदे को बताऊंगा कि उसे कहाँ बैठना है) की प्रतिक्रिया में किया गया होगा, वैसे भी कांग्रेस के नेता अपने राजनैतिक विरोधियों के प्रति स्वाभाविक आक्रामक रहते हैं और निरंतर असभ्य भाषा का प्रयोग करने के अभ्यस्त हैं. दिल्ली के मुख्य मंत्री केजरीवाल ने अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ केंद्र सरकार की हठधर्मिता के विरुद्ध धरना और प्रदर्शन किया उसे आम आदमी ने बुरा नहीं माना है; क्योंकि दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था दिली सरकार के आधीन है और कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली पुलिस केंद्र सरकार के आधीन, ऐसे में यदि दिल्ली वासियों की सुरक्षा में कमी रहती है तो दिल्ली सरकार को केवल शर्मिंदगी हाथ लगेगी, ऐसा पहले भी होता रहा है और लगभग सभी मुख्य मंत्रियो ने समय समय पर पुलिस को दिल्ली सरकार के आधीन करने की मांग की है, परन्तु बहरी एवं संवेदन हीन केंद्र सरकार के कान पर जूँ भी नहीं रेंगी, ऐसे में बहरे कानों को सुनाने के लिए धमाका आवश्यक हो जाता है और धमाके कभी संवैधानिक एवं कानून सम्मत नहीं होते. पिछले तमाम उदाहरणों से एक बात स्पष्ट है कि वर्तमान केंद्र सरकार पर शांतिपूर्ण आन्दोलनों और प्रदर्शनों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता फिर चाहे अन्नाजी का आन्दोलन हो या बाबा रामदेवजी का यह बात जनान्दोलन से निकले केजरीवाल अच्छी तरह जान चुके हैं, इसीलिय उन्होंने सीधे वही मार्ग चुना जो केंद्र सरकार को सहज समझ आ जाए. अपने इस आन्दोलन से उन्होंने अपने कई सन्देश पहुँचाने में सफलता प्राप्त की है, दिल्ली पुलिस को समझ में आगया है कि दिल्ली सरकार कि अनदेखी करना उसे महंगा पड सकता है, केंद्र सरकार को भी समझ में आगया है कि आआप की सरकार को हलके में न ले और सबसे बड़ी बात अपने वादों को पूरा न कर पाने के आरोप को पीछे ढकेलते हुए केंद्र के विरुद्ध जनमानस तैयार कर लिया. उनका यह आन्दोलन सही था ऐसा कांग्रेस के नेताओं को भी लगने लगा इसीलिये तो संजय निरूपम महाराष्ट्र में अपनी ही सरकार के विरुद्ध आन्दोलन का उच्चस्तरीय ड्रामा करने को विवश हुए.    केजरीवाल की तमाम बातों से यह तो निश्चित है कि उन्होंने एकबार तो भारत की अतिविशिष्ट शैली की राजनीति को न केवल आम आदमी की ओर मोड़ दिया है, अपितु पूर्व स्थापित सभी राजनैतिक दलों को अपनी कार्य शैली में परिवर्तन करने को विवश भी किया है; एक बात ध्यान रखने वाली है कि पुरानी सड़ी गली व्यवस्थाओं में परिवर्तन भ्रष्ट और चाटुकार लोग कभी नहीं कर सकते यह परिवर्तन कोई येडा ही कर सकता है. भारत की राजनैतिक व्यवस्था इतनी षड-गल चुकी है कि यहाँ के आम आदमी की स्थिति गुलामों से भी बदतर है और नेता चोर, लुटेरे और दुर्दान्त अपराधी होते हुए भी महाराजाओं जैसा जीवन व्यतीत कर रहे हैं. सामान्य व्यक्ति की छोटी से छोटी गुहार भी नहीं सुनी जाती है. पुलिस सहित किसी भी सरकारी विभाग में बगैर पैसे के कोई सुनवाई नहीं होती. बलात्कारी और अपराधी, नेताओं के संरक्षण में और पैसे और प्रभाव के दम पर स्वछन्द घूम रहे हैं और आम आदमी सब कुछ निरीह नेत्रों से ऐसे ही किसी पागल की बाट जोह रहा है जो सत्ता में बैठ कर सत्ता में भागीदार चोर को चोर कह सके. भारतीय जनता पार्टी जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अनुसांगिक संघटन है से राजनीति में सादगी, सुचिता और ईमानदारी की अपेक्षा थी जो भ्रांत निकली, इन लोगों ने भी कांग्रेस द्वारा स्थापित सुविधा भोगी अति विशिष्ट शैली की ही राजनीति को अपनाया इसीलिये आज कांग्रेस और बी.जे.पी. की प्रकृति में कोई मूल भूत अंतर नहीं दिखाई पड़ता है और इसी निराशा तथा हताशा का परिणाम है आम आदमी पार्टी. यद्यपि आआप के मंत्रियों के कार्यकलापों को देख कर ऐसा नहीं लगता कि यह स्थिति अधिक दिनों तक रह सकेगी, उनकी महत्वाकांक्षा और कार्य कलापों को देख कर प्रतीत होने लगा है कि ये कुछ अधिक ही असभ्य, अहंकारी और निरंकुश हैं केजरीवाल इन्हें संयमित रख सकेंगे शंका है.

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

पर हित सरिष धरम नहिं भाई

            आज सम्पूर्ण विश्व में एक अजीब सा व्यर्थ का संघर्ष चल रहा है। समाचार पत्र उठाएं या समाचार चैनल देखें अधिकाँश समाचार आतंक, अपराध और पीड़ा से सम्बंधित  ही होते हैं। अच्छे और उत्साह वर्धक समाचारों का अकाल सा पड़ गया है, सम्पूर्ण वातावरण विषाक्त सा है।  यह तब है जब विभिन्न मतों को मानने वाले धर्माचार्य निरंतर धर्म के मार्ग पर चलने का उपदेश करते दिखाई देते हैं और लाखों की संख्या में उन्हें सुनने वाले भी, फिर भी हम धर्म के मार्ग पर नहीं चल रहे, कारण क्या है? स्पष्ट है धर्म की भिन्न भिन्न व्याख्या होने के कारण; भिन्न भिन्न धर्मों को मानने वाले भिन्न भिन्न मार्गों पर चलते हुए अपने धर्म को श्रेष्ठ सिद्ध करने हेतु अशांत और संघर्ष रत हैं और चाहते हैं कि सभी उनके धर्म का अनुशरण करें। क्या धर्म कई है? नहीं, धर्म केवल और केवल एक है। क्या धर्म अलग अलग भाषाओं में भाषा बद्ध है? नहीं, उसकी एक और एक ही भाषा है। 
            जो धारण किया जाय वही धर्म है। किसके द्वारा धारण किया जाय? प्राणी मात्र के द्वारा धारण किया जाय। केवल, पुरुष द्वारा नहीं, स्त्री द्वारा नहीं, मानव द्वारा भी नहीं, अपितु सम्पूर्ण प्राणी मात्र द्वारा धारण किया जाय। 'सर्वे भवन्तु सुखिना ' अर्थात सब सुखी हों का भाव ही धर्म है। धर्म देश और काल की सीमाओं से परे है। धर्म सत्य है जो शाश्वत है, वह सबके लिए सामान रूप से उपयोगी है, उसकी भाषा ईश्वरीय भाषा है जो सहज और सरल है तथा सहज समझ में आने वाली है। धर्म को परिभाषित करते हुए महर्षि वेद्व्याषजी ने कहा है : 'अष्टादश पुराणेषु वेदव्यासश्य वचनं द्वै , परोपकाराय पुण्याय पापाय पर पीडिनम'। अर्थात १८ पुराणों का सार वेद्व्याष के दो वचनों में निहित है , परोपकार ही धर्म और पर पीड़ा ही पाप है।  इसी को तुलसीदासजी ने सहज शब्दों में व्यक्त किया है ' पर हित सरिस धरम नहीं भाई , पर पीड़ा सम नहीं अधमाई ' इसे समझने के लिए एक उदाहरण लें कुत्ते और बिल्ली में सहज शत्रुता होती है परन्तु पालतू होने पर एक साथ रहते हैं, ऐसे में यदि बिल्ली के बच्चे की माँ बच्चे को जन्म देने के पश्चात मर जाए और उसके बच्चे को कुतिया अपना दूध पिलाए तो यह दृष्य किसी को भी कैसा लगेगा? निश्चित आनन्द देने वाला होगा। यही धर्म है जो प्राणीमात्र के लिए है, इसके लिए जिस भाषा की आवश्यकता पडी, वही धर्म की भाषा है। यदि कुतिया चाहती तो बिल्ली के बच्चे को खा सकती थी यह उसका स्वाभाविक धर्म होता, मांसाहारी पशु का धर्म होता और यही सम्प्रदाय है। उसमें किसी को कोई आनन्द नहीं मिलता अपितु अधिकाँश को पीड़ा ही होती।यद्यपि कुतिया को बिल्ली के बच्चे को अपना भोजन बनाने में आनंद मिलता, परन्तु स्वयं दुसरे का भोजन बनने में डर लगता, पीड़ा होती इसीलिये यह धर्म नहीं है; मूल धर्म (परोपकार या प्रेम) में केवल आनंद है, परोपकार करने वाले को भी और परोपकारित होने वाले को भी। देश काल या स्वभाव किसी भी कारण से धर्म से हटना ही सम्प्रदाय है। सभी सम्प्रदायों की स्थापना इसी प्रकार हुई है। सम्प्रदाय सर्वमान्य, सर्वकालिक और सार्वदेशिक नहीं होता है। धर्म में कोई झगड़ा नहीं है, झगडा सम्प्रदाय में है।कुछ सम्प्रदायों के अनुयाई दुसरे सम्प्रदाय के लोगों को बलपूर्वक हिंषा या आतंक के दम पर या विभिन्न प्रकार के प्रलोभन देकर अपने सम्प्रदाय की मान्यताओं को मानने के लिए विवश करना चाहते हैं और इसे पुण्य या धर्म का कार्य मानते है जो जघन्य अपराध है और होना ही चाहिए। यदि यह कुतिया दुसरे शाकाहारी पशुओं को बलात या प्रलोभन देकर मांसाहारी सम्प्रदाय को मानने को विवश करे तो यह जघन्य पाप होगा और संघर्ष का कारण भी। आज हममें से अधिकाँश , उपासना पद्धति को धर्म मान लेते हैं, जबकि धर्म का उपासना पद्धति से कोई लेना देना नहीं है। क्या अंतर पड़ता है हम कौनसी उपासना करते हैं?  किसकी उपासना करते हैं? कैसे उपासना करते है? उपासना करते भी हैं या नहीं करते हैं। अधिकाँश लोगों का मानना है ईश्वर सर्व व्यापी है, अनादि है, अनन्त है, कण कण में व्याप्त है; फिर उसकी उपासना कैसे भी की जाए, कहीं की जाए या न भी की जाए क्या अंतर पड़ता है?तुलसीदासजी ने कहा 'हरि अनन्त हरि कथा अनंता, कहहिं सुनहिं बहु विधि सब सन्ता' अर्थात ईश्वर कण कण में है इसलिए अनन्त रूपों में है, इसीलिये सज्जन लोग उसकी उपासना विविध प्रकार से करते हैं। अब ईश्वर की उपासना किस भाषा में होनी चाहिए? संस्कृत में,हिदी में, अंग्रेजी में, अरबी या फारशी में, वह कौनसी भाषा जानता है? क्या सभी भाषाएँ जानता है? वह इनमें से कोई भाषा नहीं जानता, वह तो मात्र दिल की भाषा जानता है। जिस भाषा को बिल्ली का बच्चा और कुतिया समझती थी, जिस भाषा को तुरंत का जन्मा बच्चा माँ के अंग से लगते ही समझ लेता है। पशु के ऊपर हाथ फेरते ही वह समझ लेता है कि यह हाथ  स्नेह का है या कसाई का है। महान वैज्ञानिक जगदीश चंद वसु ने सिद्ध किया था की कुल्हाड़ी लेकर काटने के लिए आने पर वृक्ष डर जाते हैं, वहीं माली पानी देने आता है तो प्रसन्न  जाते हैं , यही ईश्वरीय भाषा है इसके लिए किसी सांसारिक भाषा की आवश्यकता नहीं पड़ती है। 'हरि व्यापक सर्वत्र समाना , प्रेम ते प्रगट होयं भगवाना ' अर्थात प्रेम की भाषा ही ईश्वर समझता है, कबीर कहते हैं 'ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय ' इसीलिये सभी मत मानते है करुण पुकार करो वह अवश्य सुनेगा। करुण पुकार माने नकली आंसू बहाना नहीं, दिल से चिंतन मनन करना। उसके लिए मंदिर, मस्जिद या चर्च जाने की भी कोई आवश्यकता नहीं है। 'कर में तो माला फिरे, जीभ फिरे मुख मांहि ; मनवा तो चहुँ दिशि फिरे, यह तो सुमिरन नाहीं'  कुछ मतों में पशु पूजा, पादप या वृक्ष पूजा, जल या नदी, सागर पूजा, पाहन, मूर्ती या पर्वत पूजा का प्रचलन है यहाँ तक की इनमें ईश्वर के मत्स्यावतार, सूकरावतार तक बताए गए हैं जिससे भ्रम होता है। वास्तव में यह इस बात का प्रतीक है कि ईश्वर सामान रूप से सर्वत्र व्याप्त है, तो फिर सभी पशु,पक्षी, जीव-जंतुओं और चराचर में भी वही है जो हम में से प्रत्येक में व्याप्त है, इसलिए वे भी हमारी तरह उसी ईश्वरीय अंश से आलोकित हैं।  उपासना का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है और धर्म का पालन प्रत्येक मानव को करना ही चाहिए क्यों कि उसके पास बुद्धि है और वह सम्पूर्ण समाज का एक अंग भूत घटक है। 
                 भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है 'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं  सृज्याम्य्हम। परित्राणाय साधूनां  विनाशाय  च दुष्कृताम धर्मसंस्थाप्नार्थाय सम्भवामि युगे युगे। अर्थात जब जब धर्म का नाश होता है, इसमें कहीं उपासना पद्धति को नहीं माना है। धर्म याने परोपकाराय, जब लोग परपीड़ा में उद्यत होते हैं अर्थात अधर्म बढ़ता है तब तब धर्म की स्थापना करने सज्जनों की रक्षा करने और दुष्टों को अर्थात आतंकियों, बलात्कारियों या दूसरों को अनायाष पीड़ा पहुचाने वालों का संघार करने या दण्ड देने के लिए मैं प्रगट होता हूँ। अर्थात कृष्ण नहीं अपितु वह जगत नियंता जो जन जन में व्याप्त है किसी भी जीव में अपनी असीमित शक्ति दे देता है फिर चाहे वह मगर हो, सूअर हो, राम हों, कृष्ण हों, बुद्ध हों, महावीर हों, नानक हों, गांधी हों, मुहम्मद साहब हों या ईशा मशीह हों, सबने अपने अपने समय पर आवश्यकतानुसार लोक कल्याण का कार्य किया, भले ही उस समय कुछ बातों में वे मूल धर्म से हटे हों, इसीलिये उनमें से कई का बताया मार्ग अलग सम्प्रदाय बना जो उस समय उपयोगी और आवश्यक था। धर्म का पालन पहले शाषक करे फिर प्रजा को धर्म का अनुशरण करने के लिए विवश करे यही शाषक का कार्य है ; परन्तु जब शाषक ही अधर्मी हो तो महाभारत ही एक मार्ग बचता है। यदि लोग धर्म का पालन करने वाले हो (चाहे ईश्वर को जिस रूप में माने या न माने) तो कोई किसी की अनावश्यक हत्या कैसे करेगा? बलात्कार कैसे करेगा? घूष कैसे लेगा? दलाली कैसे लेगा? डाका कैसे डालेगा? भ्रूण हत्या कैसे करेगा? धर्म को मानने वाला समाज सहज ही अपराधमुक्त हो जाएगा। यदि समाज, राष्ट्र और विश्व, केवल मानव कल्याण ही नहीं अपितु सबका कल्याण चाहते है और अपराधमुक्त विश्व चाहते हैं तो सम्प्रदायों की कट्टरता को त्याग कर धार्मिक (परहित सरिष धरम नहीं भाई) होना ही होगा अन्यथा अशांति और विनाश निश्चित है। 

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

भारत की मरती आत्मा और बढ़ते अपराध

             अनादि काल से भारत की आत्मा आद्ध्यात्म रही है, धर्म रही है।  धर्म से तात्पर्य किसी उपासना पद्धति से नहीं है। उपासना पद्धति धर्म है भी नहीं ; धर्म तो सत्य है, सार्वकालिक है, सार्वदेशिक है, सर्वमान्य है उसमें किसी प्रकार का विवाद नहीं है 'सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया ' अर्थात सब सुखी हों सब सज्जन हों का भाव ही धर्म है। इसमें किसी को कोई विवाद उत्पन्न करने का कोई अवसर ही नहीं है। 'मातृवत पर दारेषु , पर द्रव्येषु लोष्ठ वत। आत्मवत सर्व भूतेषु यः पश्यति सः पंडिता  ' अर्थात दुसरे की स्त्री को माता सामान और दुसरे की संपदा को मिट्टी के समान समझो तथा सभी को अपने सामान ही समझो का भाव ही धर्म है।  इसमें यदि किसी को अपने कुविचारों के कारण आपत्ति होती है तो भी अपने साथ वह ऐसा ही वर्ताव चाहेगा अर्थात यही धर्म है और यही भारत की आत्मा रही है।  बच्चे के गर्भ में प्रवेश के साथ ही माता ऐसे सुविचारों का चिंतन मनन एवं श्रवण करते हुए भावी सन्तति को महान मानवीय गुणों से परिपूर्ण करने के प्रयास में लग जाती थी और शिशु के जन्मोपरान्त लोरियों और लोकगीतों , कहानियों , भजनों द्वारा घुट्टी के साथ उसमें मानवीय श्रेष्ठ गुणों का समावेश प्रारम्भ कर देती थी।  छोटी छोटी कहानियों में बच्चे को माँ , दादी , नानी हर समय स्मरण कराती रहती थी किसी का कितना भी मूल्यवान सामान तुम्हारे लिए तुक्छ है उधर देखो भी नहीं 'रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पी, देख पराई चूपड़ी मत ललचावे जीव' सभी बालिकाएं तुम्हारी बहन जैसी हैं और बालक भाई समान । स्त्री को सम्मान देना और संकट में उसकी सहायता करना ही पुरुषत्व है , वीरता है 'यत्र नार्यस्तु पूजन्ते , रमन्ते तत्र देवता '। दीन दुखियों के लिए प्राणोत्सर्ग कर देना ही धर्म है 'जो लड़े दीन के हेत सूरा सोई ' किसी की ह्त्या पाप है यहाँ तक कि बगैर किसी कारण के चीटी की हत्या भी पाप मानी जाती है और आत्म ह्त्या महा पाप है,'अहिंसा परमो धर्मः ' बालकों ,वृद्धों एवं स्त्रियों का बध जघन्य अपराध माना जाता है ; 'बालक जानि बधऊँ नहि तोही ' इस प्रकार के दुष्कर्म करने वालों को ही राक्षस कहा गया, स्त्रियों के साथ एक साथ कई लोगों द्वारा बलात सम्बन्ध बनाने, उनके नाजुक अंगों को चोट पहुचाने या शिशुओं के साथ यौन सम्बन्ध बनाने या उनकी हत्या करने वालों को म्लेक्छ या पिशाच कहा गया, विदेशी आक्रमणकारियों के आने के पूर्व इस जघन्य पाप के विषय में भारत में कोई सोच भी नहीं सकता था। सेनाएं आपस में युद्ध किया करती थीं परन्तु सामान्य नागरिक पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। ये सेनाएं नागरिकों को नहीं लूटती थीं उन्हें कोई छति नहीं पहुंचाई जाती थी इसी लिए कहा गया 'कोउ नृप होय हमें का हानी ', भारत में जहाँ व्यर्थ की हिंसा का विरोध किया गया वहीं सज्जनों की सहायता के लिए दुष्टों का सँघार करना ईश्वरीय कार्य माना जाता रहा है 'परित्राणाय साधुनाम , विनाशाय च दुश्क्रताम  ' मृत्यु से भयभीत मत हो वह शाश्वत है। यह आत्मा अजर अमर है मरता तो केवल शरीर है, इस प्रकार अमरता का भाव बचपन से उत्पन्न किया जाता था।  कायर और कुकर्मी मनुष्य अपमानित हो कर बार बार प्रतिदिन मरता है परन्तु सदाचारी और पराक्रमी मनुष्य धर्म के लिए मर कर भी अमर रहता है। जितना तुम्हारे पास है उसी में संतोष करो 'संतोषम परम सुखं' या गो धन गज धन बाजि धन सब धन और रतन धन खानि , जब आवै संतोष धन सब धन धूरि सामान ' इक्छाओं का अंत नहीं है उन पर नियंत्रण आवश्यक है। परन्तु पूर्ण मनोयोग से कर्म करना है, फल ईश्वर के आधीन है; इस विचार से असफलता में भी निराशा नहीं होती है। चार पुरुषार्थ धर्म अर्थ काम मोक्ष को प्राप्त करना ही मानव जीवन है अर्थात धर्म पूर्वक धन कमाना ,संचित करना , धर्म पूर्वक काम की पूर्ति करना अर्थात जीवन में कुछ भी करना उसमें धर्म की प्रधानता रहनी है।  रात्रि होने पर पौधों को मत छुओ वो सोते हैं , पौधों को मत सताओ , कच्चे फलों को मत तोड़ो हरे पेड़ों को मत काटो  उनमे जीवन होता है इसी दादी नानी की कहानियों को सुन कर महान वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र वसु ने विश्व को विवश किया यह मानने के लिए कि पौधों में जीवन होता है। जल जीवन है उसकी बर्बादी मत करो , अन्न देवता है, एक भी दाना बर्बाद करना महा पाप है , गंगा सहित सभी नदियाँ जीवन दाईनी हैं माँ के समान है उनकी उपासना करो उन्हें गंदा मत करो। यह सब बच्चों की घुट्टी के साथ उसके रक्त में घोल दिया जाता है। 
          इस सब के लिए शासन से कोई धन राशि आवंटित नहीं होती थी; परन्तु समाज अपराध नियंत्रित था समाज में अपराधियों को हेय द्रष्टि से देखा जाता था।  नदियाँ निर्मल नीरा और स्वक्छ थीं धरा विविध प्रकार की वनस्पतियों से हरी भरी थी। अति गरीब व्यक्ति भी भूखे पेट रह कर भी अपराध या आत्महत्या के विषय में नहीं सोचता था ,ऐसा सोचना भी पाप होता था। अपनी हर स्थिती पर संतोष था। सभी लोग प्रतिदिन सायं कुछ समय धर्म चर्चा को देते थे , राम की पित्रभक्ति  और भरत का भाई के प्रति प्रेम जन जन के ह्रदय में रहता था। हरिशचंद्र का सत्य प्रेम, दधीच का परोपकार , पन्ना धाय की स्वामी भक्ति , हाड़ी रानी का मोह रहित बलिदान , महाराणा प्रताप की घाष की रोटियां खा कर भी दासता स्वीकार न करना , छत्रपति शिवाजी का स्त्री जाति के लिए सम्मान और प्रेम यह सब बच्चों के रक्त में जन्म से ही मिल जाता था ; शाषक जनता का पोषक होता था, उसे ईश्वर का स्थान दिया गया उसके लिए अपना पराया कोई नहीं होता था (अहिल्या बाई होल्कर की न्याय प्रियता विश्व प्रसिद्ध है जिन्होंने अपने ही पुत्र को हाथी से कुचलवा दिया था ) उसे बार बार स्मरण दिलाया जाता था 'जासु राज अति प्रजा दुखारी , सो नृप अवस नरक अधिकारी 'शायद इसी भारत के लिए कहा गया कि ' कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ' ;परन्तु आज हम छद्म धर्मनिर्पेक्छ्ता का लबादा ओड़ कर और पश्चिम का अन्धानुकरण करके वस्तिविक धर्म से बहुत दूर हो गए और अपराध तथा कुकर्म की दुनिया में आकंठ डूब गए हैं। शाषक से लेकर प्रजा तक सभी अपराध में लिप्त हैं , आज सबसे बड़ा अपराधी ही सर्वाधिक सम्मानित है। सचरित्र व्यक्ति उपेक्षित और उपहास का पात्र है। माता पिता और शिक्षक नैतिक मूल्य बढ़ाने के स्थान पर अर्थोपार्जन पर जोर देते हैं। विनम्रता के स्थान पर अहंकार बढाया जा रहा है। 'मात पिता बाल्कान्ह्ही बुलावईं उदर भरै सो नीति सिखावहीं ' आज घरों में धर्म चर्चा होने के स्थान पर षड्यंत्रों, हत्याओं और बलात्कारों से युक्त टी वी सीरियल देखे जाते हैं। विभिन्न विज्ञापनों में उत्तेजना पूर्ण नारी योवन परोसा जाता है। बचपन से कार्टून सीरियलों में बच्चों को उद्दंड , अवज्ञाकारी और असहनशील बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। आज हमारे आदर्श और प्रेरणा श्रोत बदल गए हैं धन महत्वपूर्ण हो गया है , फिर चाहे किसी भी मार्ग से अर्जित किया जाय, इसीलिये  सचरित्र, राष्ट्रभक्तों,श्रेष्ठ महापुरुषों के चित्रों के स्थान पर घरों में फूहड़ द्विअर्थी संवादों और उत्तेजना पूर्ण अंग प्रदर्शन करने वाले गीतों पर नृत्य और अभिनय करके जीविका चलाने वालों के चित्र लगाते हैं। प्रातः कोई संत वाणी या सचरित्र्ता की बात सुनने या गुनगुनाने के स्थान पर 'चोली के नीचे क्या है ' जैसे फूहड़ गीत सुनते और गाते हैं। बगैर विवाह के एक या एक से अधिक लोगों से शारीरिक सम्बन्ध रखने वालों को वेश्या कहा जाता है। क्या हमारे समाज में इस प्रकार का चलन नहीं बढ़ा है और ऐसे लोगों का सम्मान नहीं बढ़ा है ? यह दुर्भाग्य पूर्ण है। ऐसी स्थिति में  हम हजार प्रयाष कर लें लाखों क़ानून बना लें कोई सुधार होने वाला नहीं है। जब तक शाषक शुद्ध आचरण और नैतिकता से पूर्ण नहीं होंगे तथा घरों और विद्यालयों में अद्ध्यात्मिक तथा नैतिक वातावरण नहीं बनेगा अभिभावकों सहित शिक्षकों को नैतिकता की ओर कदम बढ़ा कर बच्चों में धर्म और नैतिकता के मूल्य उत्पन्न करने ही होंगे अन्यथा अपराध बढ़ते ही जाएंगे। 
              यदि लोक कल्याण करना है समाज को अपराधमुक्त करना है और चरित्रवान राष्ट्र का निर्माण करना है तो उन उच्च नैतिक एवं आद्ध्यात्मिक मूल्यों को पुनर्स्थापित करना ही होगा जिन्हें हम भौतिकवादी पूंजीवादी व्यवस्था में दकियानूसी और साम्प्रदायिक बता कर छोड़ चुके हैं ।